Couplets Poetry (page 86)
दूसरों के ज़ख़्म बुन कर ओढ़ना आसाँ नहीं
शहपर रसूल
उड़ती सी 'शेफ़्ता' की ख़बर कुछ सुनी है आज
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
तूफ़ान-ए-नूह लाने से ऐ चश्म फ़ाएदा
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
शायद इसी का नाम मोहब्बत है 'शेफ़्ता'
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
किस लिए लुत्फ़ की बातें हैं फिर
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
इज़हार-ए-इश्क़ उस से न करना था 'शेफ़्ता'
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
इतनी न बढ़ा पाकी-ए-दामाँ की हिकायत
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
हम तालिब-ए-शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
हज़ार दाम से निकला हूँ एक जुम्बिश में
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
फ़साने यूँ तो मोहब्बत के सच हैं पर कुछ कुछ
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
फ़साने अपनी मोहब्बत के सच हैं पर कुछ कुछ
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
दिल-ए-बद-ख़ू की किसी तरह रऊनत कम हो
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
बे-उज़्र वो कर लेते हैं व'अदा ये समझ कर
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ऐ ताब-ए-बर्क़ थोड़ी सी तकलीफ़ और भी
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
आशुफ़्ता-ख़ातिरी वो बला है कि 'शेफ़्ता'
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ज़ुल्म तो बे-ज़बान है लेकिन
शीन काफ़ निज़ाम
यादों की रुत के आते ही सब हो गए हरे
शीन काफ़ निज़ाम
याद और याद को भुलाने में
शीन काफ़ निज़ाम
वहशत तो संग-ओ-ख़िश्त की तरतीब ले गई
शीन काफ़ निज़ाम
ऊँची इमारतें तो बड़ी शानदार हैं
शीन काफ़ निज़ाम
सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है
शीन काफ़ निज़ाम
साहिलों की शफ़ीक़ आँखों में
शीन काफ़ निज़ाम
पत्तियाँ हो गईं हरी देखो
शीन काफ़ निज़ाम
निकले कभी न घर से मगर इस के बावजूद
शीन काफ़ निज़ाम
मंज़र को किसी तरह बदलने की दुआ दे
शीन काफ़ निज़ाम
कोई दुआ कभी तो हमारी क़ुबूल कर
शीन काफ़ निज़ाम
किसी के साथ अब साया नहीं है
शीन काफ़ निज़ाम
कहाँ जाती हैं बारिश की दुआएँ
शीन काफ़ निज़ाम
जिन से अँधेरी रातों में जल जाते थे दिए
शीन काफ़ निज़ाम