Couplets Poetry (page 85)

हो उम्र-ए-ख़िज़्र भी तो हो मालूम वक़्त-ए-मर्ग

ज़ौक़

हक़ ने तुझ को इक ज़बाँ दी और दिए हैं कान दो

ज़ौक़

हमें नर्गिस का दस्ता ग़ैर के हाथों से क्यूँ भेजा

ज़ौक़

है ऐन-ए-वस्ल में भी मिरी चश्म सू-ए-दर

ज़ौक़

गुल उस निगह के ज़ख़्म-रसीदों में मिल गया

ज़ौक़

गया शैतान मारा एक सज्दा के न करने में

ज़ौक़

एक पत्थर पूजने को शैख़ जी काबे गए

ज़ौक़

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

ज़ौक़

एहसान ना-ख़ुदा का उठाए मिरी बला

ज़ौक़

दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ

ज़ौक़

दुकान-ए-हुस्न में मिलती नहीं मता-ए-वफ़ा

ज़ौक़

दिखाने को नहीं हम मुज़्तरिब हालत ही ऐसी है

ज़ौक़

देख छोटों को है अल्लाह बड़ाई देता

ज़ौक़

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए

ज़ौक़

बे-क़रारी का सबब हर काम की उम्मीद है

ज़ौक़

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे

ज़ौक़

बाक़ी है दिल में शैख़ के हसरत गुनाह की

ज़ौक़

बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो

ज़ौक़

बैठे भरे हुए हैं ख़ुम-ए-मय की तरह हम

ज़ौक़

बा'द रंजिश के गले मिलते हुए रुकता है दिल

ज़ौक़

अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा

ज़ौक़

ऐ शम्अ तेरी उम्र-ए-तबीई है एक रात

ज़ौक़

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

ज़ौक़

कौन पुरसाँ है हाल-ए-बिस्मिल का

शैख़ अली बख़्श बीमार

रेख़्ता का इक नया मज्ज़ूब है 'शहपर' रसूल

शहपर रसूल

मुझे भी लम्हा-ए-हिजरत ने कर दिया तक़्सीम

शहपर रसूल

मैं ने भी देखने की हद कर दी

शहपर रसूल