Couplets Poetry (page 83)

जम्अ कर लीजिए ग़ैरों को मगर ख़ूबी-ए-बज़्म

शिबली नोमानी

फ़राज़-ए-दार पे भी मैं ने तेरे गीत गाए हैं

शिबली नोमानी

अजब क्या है जो नौ-ख़ेज़ों ने सब से पहले जानें दीं

शिबली नोमानी

आप जाते तो हैं उस बज़्म में 'शिबली' लेकिन

शिबली नोमानी

जब निगाहों के इशारात बदल जाते हैं

शेवन बिजनौरी

ये बाज़ी मोहब्बत की बाज़ी है नादाँ

शेरी भोपाली

तमन्ना है यही दिल की वहीं चलिए वहीं चलिए

शेरी भोपाली

क़यामत है ये कह के उस ने लौटाया है क़ासिद को

शेरी भोपाली

क़यामत है ये कह कर उस ने लौटाया है क़ासिद को

शेरी भोपाली

क़त्अ होती जा रही हैं ज़िंदगी की मंज़िलें

शेरी भोपाली

मोहब्बत मअ'नी ओ अल्फ़ाज़ में लाई नहीं जाती

शेरी भोपाली

बराबर ख़फ़ा हों बराबर मनाएँ

शेरी भोपाली

अभी तो दिल में हल्की सी ख़लिश महसूस होती है

शेरी भोपाली

निगह-ए-लुत्फ़ में है उक़्दा-कुशाई मुज़्मर

शेर सिंह नाज़ देहलवी

चूम कर आया है ये दस्त-ए-हिनाई आप का

शेर सिंह नाज़ देहलवी

कुछ सुर्ख़ जो है रंग मिरे अश्क-ए-रवाँ का

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

गुंजाइश-ए-दो-शाह नहीं एक मुल्क में

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला

ज़ौक़

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ

ज़ौक़

याँ लब पे लाख लाख सुख़न इज़्तिराब में

ज़ौक़

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

ज़ौक़

उठते उठते मैं ने इस हसरत से देखा है उन्हें

ज़ौक़

तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे

ज़ौक़

तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभी

ज़ौक़

तू जान है हमारी और जान है तो सब कुछ

ज़ौक़

तवाज़ो का तरीक़ा साहिबो पूछो सुराही से

ज़ौक़

सितम को हम करम समझे जफ़ा को हम वफ़ा समझे

ज़ौक़

शुक्र पर्दे ही में उस बुत को हया ने रक्खा

ज़ौक़

सज्दे में उस ने हम को आँखें दिखा के मारा

ज़ौक़

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

ज़ौक़