Couplets Poetry (page 81)

सर्दी भी ख़त्म हो गई बरसात भी गई

शुजा ख़ावर

सभी ज़िंदगी पे फ़रेफ़्ता कोई मौत पर नहीं शेफ़्ता

शुजा ख़ावर

सब का ही नाम लेते हैं इक तुझ को छोड़ कर

शुजा ख़ावर

रिंद खड़े हैं मिम्बर मिम्बर

शुजा ख़ावर

क़लम में ज़ोर जितना है जुदाई की बदौलत है

शुजा ख़ावर

मिरे हालात को बस यूँ समझ लो

शुजा ख़ावर

कुछ नहीं बोला तो मर जाएगा अंदर से 'शुजाअ'

शुजा ख़ावर

करम है मुझ पे किसी और के जलाने को

शुजा ख़ावर

जो ज़िंदा हो उसे तो मार देते हैं जहाँ वाले

शुजा ख़ावर

जिन को क़ुदरत है तख़य्युल पर उन्हें दिखता नहीं

शुजा ख़ावर

जैसा मंज़र मिले गवारा कर

शुजा ख़ावर

इसी पर ख़ुश हैं कि इक दूसरे के साथ रहते हैं

शुजा ख़ावर

हम सूफ़ियों का दोनों तरफ़ से ज़ियाँ हुआ

शुजा ख़ावर

हज़ार रंग में मुमकिन है दर्द का इज़हार

शुजा ख़ावर

घर में बेचैनी हो तो अगले सफ़र की सोचना

शुजा ख़ावर

दो चार नहीं सैंकड़ों शेर उस पे कहे हैं

शुजा ख़ावर

दिल में नफ़रत हो तो चेहरे पे भी ले आता हूँ

शुजा ख़ावर

दिल की बातें दूसरों से मत कहो लुट जाओगे

शुजा ख़ावर

दर्द जाएगा तो कुछ कुछ जाएगा पर देखना

शुजा ख़ावर

चारागरी की बात किसी और से करो

शुजा ख़ावर

औरों से पूछिए तो हक़ीक़त पता चले

शुजा ख़ावर

आप इधर आए उधर दीन और ईमान गए

शुजा ख़ावर

ईद को भी वो नहीं मिलते हैं मुझ से न मिलें

शोला अलीगढ़ी

बुतों में कोई भलाई भी है सिवाए सितम

शोला अलीगढ़ी

ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को

शोहरत बुख़ारी

पर्दे में ख़मोशी के बुर्के में उदासी के

शोहरत बुख़ारी

कुछ ऐसा धुआँ है कि घुट्टी जाती हैं साँसें

शोहरत बुख़ारी

जब तुझे भूलना चाहा दिल ने

शोहरत बुख़ारी

हर सम्त फ़लक-बोस पहाड़ों की क़तारें

शोहरत बुख़ारी

हाँ ऐ ग़म-ए-इश्क़ मुझ को पहचान

शोहरत बुख़ारी