Couplets Poetry (page 79)

ऐ शोख़ गुलिस्ताँ मैं नहीं ये गुल-ए-रंगीं

सिराज औरंगाबादी

ऐ नूर-ए-नज़र मुंतज़िर-ए-वस्ल हूँ आ जा

सिराज औरंगाबादी

ऐ नसीम-ए-सहरी बू-ए-मोहब्बत ले आ

सिराज औरंगाबादी

ऐ अक़्ल निकल जा कि धुआँ आह का नहीं है

सिराज औरंगाबादी

अबस इन शहरियों में वक़्त अपना हम किए ज़ाए

सिराज औरंगाबादी

आँख उठाते ही मिरे हाथ सीं मुझ कूँ ले गए

सिराज औरंगाबादी

आई है तिरे इश्क़ की बाज़ी दिल-ओ-जाँ पर

सिराज औरंगाबादी

आ शिताबी सीं वगर्ना मज्लिस-ए-उश्शाक़ में

सिराज औरंगाबादी

वो इतनी शिद्दतों से सोचता है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

तोड़े बग़ैर संग तराशे न जाएँगे

सिरज़ अालम ज़ख़मी

सदा-ए-दिल को कहीं बारयाब होना था

सिरज़ अालम ज़ख़मी

क्या हमसरी की हम से तमन्ना करे कोई

सिरज़ अालम ज़ख़मी

कोई शिकवा कोई गिला दे दे

सिरज़ अालम ज़ख़मी

ख़ुद को बचाऊँ जिस्म सँभालूँ कि रूह को

सिरज़ अालम ज़ख़मी

इतना न दूर जाओ कि जीना मुहाल हो

सिरज़ अालम ज़ख़मी

दिल में तूफ़ान नहीं आँख में सैलाब नहीं

सिरज़ अालम ज़ख़मी

दिल में रह रह के शोर उठता है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

बिखरते टूटते लम्हों में ऐसा लगता है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

बेवफ़ाई का मुझे इल्ज़ाम देता था वो शख़्स

सिरज़ अालम ज़ख़मी

तमीज़-ए-ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त है शर्त-ए-बेदारी

सिकंदर अली वज्द

ख़ुदा शाहिद है मेरे भूलने वाले ब-जुज़ तेरे

सिकंदर अली वज्द

जाने वाले कभी नहीं आते

सिकंदर अली वज्द

दिल की बस्ती अजीब बस्ती है

सिकंदर अली वज्द

देर से आ रही है याद तिरी

सिकंदर अली वज्द

बहार आए तो ख़ुद ही लाला ओ नर्गिस बता देंगे

सिकंदर अली वज्द

अहल-ए-हिम्मत को बलाओं पे हँसी आती है

सिकंदर अली वज्द

मुझ को तो ख़ैर ख़ाना-बदोशी ही रास थी

सिदरा सहर इमरान

इस नए साल के स्वागत के लिए पहले से

सिदरा सहर इमरान

उठे हैं हाथ तो अपने करम की लाज बचा

सिद्दीक़ मुजीबी

नाख़ुदा हो कि ख़ुदा देखते रह जाते हैं

सिद्दीक़ मुजीबी