Couplets Poetry (page 77)

मुवाफ़क़त करे क्यूँ मय-कशों सती ज़ाहिद

सिराज औरंगाबादी

मुस्तइद हूँ तिरे ज़ुल्फ़ों की सियाही ले कर

सिराज औरंगाबादी

मुश्ताक़ हूँ तुझ लब की फ़साहत का व-लेकिन

सिराज औरंगाबादी

मुझ रंग ज़र्द ऊपर ग़ुस्से सीं लाल मत हो

सिराज औरंगाबादी

मुझ कूँ हर आन तिरे दर्द सीं बहबूदी है

सिराज औरंगाबादी

मुफ़्ती-ए-नाज़ ने दिया फ़तवा

सिराज औरंगाबादी

मिरे सीं दूर क्या चाहते हैं साया-ए-इश्क़

सिराज औरंगाबादी

मत करो शम्अ को बदनाम जलाती वो नहीं

सिराज औरंगाबादी

मस्जिद वहशत में पढ़ता है तरावीह-ए-जुनूँ

सिराज औरंगाबादी

मस्जिद में तुझ भँवों की ऐ क़िबला-ए-दिल-ओ-जाँ

सिराज औरंगाबादी

मस्जिद अबरू में तेरी मर्दुमुक है जिऊँ इमाम

सिराज औरंगाबादी

मरहम तिरे विसाल का लाज़िम है ऐ सनम

सिराज औरंगाबादी

मकतब-ए-इश्क़ का मोअल्लिम हूँ

सिराज औरंगाबादी

मकतब में मिरे जुनूँ के मजनूँ

सिराज औरंगाबादी

मैं कहा क्या अरक़ है तुझ रुख़ पर

सिराज औरंगाबादी

मैं हूँ तो दिवाना प किसी ज़ुल्फ़ का नहीं हूँ

सिराज औरंगाबादी

क्यूँकि होवे ज़ाहिद ख़ुद-बीं मुरीद-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार

सिराज औरंगाबादी

क्या पूछते हो तुम कि तिरा दिल किधर गया

सिराज औरंगाबादी

क्या होएगा सुनोगे अगर कान धर के तुम

सिराज औरंगाबादी

कुफ़्र-ओ-ईमाँ दो नदी हैं इश्क़ कीं

सिराज औरंगाबादी

किया ख़ाक आतिश-ए-इश्क़ ने दिल-ए-बे-नवा-ए-'सिराज' कूँ

सिराज औरंगाबादी

किया है जब सीं अमल बे-ख़ुदी के हाकिम ने

सिराज औरंगाबादी

खुल गए उस की ज़ुल्फ़ के देखे

सिराज औरंगाबादी

ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही

सिराज औरंगाबादी

कान में है तेरे मोती आब-दार

सिराज औरंगाबादी

कहते हैं तिरी ज़ुल्फ़ कूँ देख अहल-ए-शरीअत

सिराज औरंगाबादी

कचेहरी में चमन की हर तरफ़ फ़रियाद बुलबुल है

सिराज औरंगाबादी

कभी तुम मोम हो जाते हो जब मैं गर्म होता हूँ

सिराज औरंगाबादी

कभी सम्त-ए-ग़ैब सीं क्या हुआ कि चमन ज़ुहूर का जल गया

सिराज औरंगाबादी

कभी ला ला मुझे देते हो अपने हात सीं प्याला

सिराज औरंगाबादी