Couplets Poetry (page 75)
कम-ज़र्फ़ की निय्यत क्या पिघला हुआ लोहा है
सिराज लखनवी
कैसे फाँदेगा बाग़ की दीवार
सिराज लखनवी
जो अश्क सुर्ख़ है नामा-निगार है दिल का
सिराज लखनवी
जान सी शय की मुझे इश्क़ में कुछ क़द्र नहीं
सिराज लखनवी
इश्क़ का बंदा भी हूँ काफ़िर भी हूँ मोमिन भी हूँ
सिराज लखनवी
इस सोच में बैठे हैं झुकाए हुए सर हम
सिराज लखनवी
इस दिल में तो ख़िज़ाँ की हवा तक नहीं लगी
सिराज लखनवी
हो गया आइना-ए-हाल भी गर्द-आलूदा
सिराज लखनवी
हर नफ़्स उतनी ही लौ देगा 'सिराज'
सिराज लखनवी
हर अश्क-ए-सुर्ख़ है दामान-ए-शब में आग का फूल
सिराज लखनवी
हाँ तुम को भूल जाने की कोशिश करेंगे हम
सिराज लखनवी
हैरान हैं अब जाएँ कहाँ ढूँडने तुम को
सिराज लखनवी
ग़ुस्ल-ए-तौबा के लिए भी नहीं मिलती है शराब
सिराज लखनवी
इक काफ़िर-ए-मुतलक़ है ज़ुल्मत की जवानी भी
सिराज लखनवी
एक एक से भीक आँसुओं की माँग रहा हूँ
सिराज लखनवी
दिया है दर्द तो रंग-ए-क़ुबूल दे ऐसा
सिराज लखनवी
दाम-बर-दोश फिरें चाहे वो गेसू बर-दोश
सिराज लखनवी
दम घुटा जाता है मोहब्बत का
सिराज लखनवी
चराग़ सज्दा जला के देखो है बुत-कदा दफ़्न ज़ेर-ए-काबा
सिराज लखनवी
चंद तिनकों की सलीक़े से अगर तरतीब हो
सिराज लखनवी
चमक शायद अभी गीती के ज़र्रों की नहीं देखी
सिराज लखनवी
बड़ों-बड़ों के क़दम डगमगाए जाते हैं
सिराज लखनवी
अभी रक्खा रहने दो ताक़ पर यूँही आफ़्ताब का आइना
सिराज लखनवी
आप के पाँव के नीचे दिल है
सिराज लखनवी
आँसू हैं कफ़न-पोश सितारे हैं कफ़न-रंग
सिराज लखनवी
आँखों पर अपनी रख कर साहिल की आस्तीं को
सिराज लखनवी
आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम
सिराज लखनवी
आग और धुआँ और हवस और है इश्क़ और
सिराज लखनवी
ज़िंदगानी दर्द-ए-सर है यार बिन
सिराज औरंगाबादी
ज़ि-बस काफ़िर-अदायों ने चलाए संग-ए-बे-रहमी
सिराज औरंगाबादी