Couplets Poetry (page 73)

मिलते गए हैं मोड़ नए हर मक़ाम पर

सूफ़ी तबस्सुम

कितनी फ़रियादें लबों पर रुक गईं

सूफ़ी तबस्सुम

खुल के रोने की तमन्ना थी हमें

सूफ़ी तबस्सुम

कौन किस का ग़म खाए कौन किस को बहलाए

सूफ़ी तबस्सुम

जब भी दो आँसू निकल कर रह गए

सूफ़ी तबस्सुम

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं

सूफ़ी तबस्सुम

इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न का दामन फिर भी ख़ाली

सूफ़ी तबस्सुम

एक शोला सा उठा था दिल में

सूफ़ी तबस्सुम

इक फ़क़त याद है जाना उन का

सूफ़ी तबस्सुम

देखे हैं बहुत हम ने हंगामे मोहब्बत के

सूफ़ी तबस्सुम

औरों की मोहब्बत के दोहराए हैं अफ़्साने

सूफ़ी तबस्सुम

ऐसा न हो ये दर्द बने दर्द-ए-ला-दवा

सूफ़ी तबस्सुम

आज 'तबस्सुम' सब के लब पर

सूफ़ी तबस्सुम

ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं

सुदर्शन फ़ाकिर

ये सिखाया है दोस्ती ने हमें

सुदर्शन फ़ाकिर

तेरी आँखों में हम ने क्या देखा

सुदर्शन फ़ाकिर

तेरे जाने में और आने में

सुदर्शन फ़ाकिर

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरे रुकते ही मिरी साँसें भी रुक जाएँगी

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरे दुख की कोई दवा न करो

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है

सुदर्शन फ़ाकिर

इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक़ नहीं

सुदर्शन फ़ाकिर

हम से पूछो न दोस्ती का सिला

सुदर्शन फ़ाकिर

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

सुदर्शन फ़ाकिर

हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त

सुदर्शन फ़ाकिर

दिल तो रोता रहे ओर आँख से आँसू न बहे

सुदर्शन फ़ाकिर

देखने वालो तबस्सुम को करम मत समझो

सुदर्शन फ़ाकिर

आशिक़ी हो कि बंदगी 'फ़ाख़िर'

सुदर्शन फ़ाकिर

मैं जुदाई का मुक़र्रर सिलसिला हो जाऊँगा

सुबोध लाल साक़ी