Couplets Poetry (page 72)
मैं अब्र-ओ-बाद से तूफ़ाँ से सब से डरता हूँ
सुलतान रशक
माना कि हम वतन से अज़ीज़ों से दूर हैं
सुलतान फ़ारूक़ी
ये और बात कि 'अख़्तर' हवेलियाँ न रहीं
सुल्तान अख़्तर
सामने आँखों के फिर यख़-बस्ता मंज़र आएगा
सुल्तान अख़्तर
सफ़र सफ़र मिरे क़दमों से जगमगाया हुआ
सुल्तान अख़्तर
सब के होंटों पे मुनव्वर हैं हमारे क़िस्से
सुल्तान अख़्तर
फिर भी हम लोग वहाँ जीते हैं जीने की तरह
सुल्तान अख़्तर
मैं वो सहरा जिसे पानी की हवस ले डूबी
सुल्तान अख़्तर
किसी के वास्ते जीता है अब न मरता है
सुल्तान अख़्तर
हर एक दास्ताँ तुझ से शुरूअ होती है
सुल्तान अख़्तर
हमारी सादा-मिज़ाजी पे रश्क करते हैं
सुल्तान अख़्तर
फ़ुर्सत में रहा करते हैं फ़ुर्सत से ज़्यादा
सुल्तान अख़्तर
उम्र भर चल के भी पाई नहीं मंज़िल हम ने
सुलेमान ख़ुमार
मैं वाक़िफ़ हूँ तिरी चुप-गोइयों से
सुलेमान ख़ुमार
इक ख़ौफ़-ए-बे-पनाह है आँखों के आर-पार
सुलेमान ख़ुमार
एक हम्माम में तब्दील हुई है दुनिया
सुलैमान अरीब
एक हम्माम में तब्दील हुई है दुनिया
सुलैमान अरीब
'अरीब' देखो न इतराओ चंद शेरों पर
सुलैमान अरीब
ज़िंदगी जिस ने तल्ख़ की मेरी
सुहैल अख़्तर
पहाड़ जैसे दिनों को तो काट लूँ लेकिन
सुहैल अख़्तर
पेड़ ऊँचा है मगर ज़ेर-ए-ज़मीं कितना है
सुहैल अहमद ज़ैदी
कभी तो लगता है गुमराह कर गई मुझ को
सुहैल अहमद ज़ैदी
हम ने तो मूँद लीं आँखें ही तिरी दीद के बाद
सुहैल अहमद ज़ैदी
हम हार तो जाते ही कि दुश्मन के हमारे
सुहैल अहमद ज़ैदी
हर सुब्ह अपने घर में उसी वक़्त जागना
सुहैल अहमद ज़ैदी
इक मौज-ए-फ़ना थी जो रोके न रुकी आख़िर
सुहैल अहमद ज़ैदी
दो पाँव हैं जो हार के रुक जाते हैं
सुहैल अहमद ज़ैदी
देखो तो हर इक शख़्स के हाथों में हैं पत्थर
सुहैल अहमद ज़ैदी
होता है मिरे दिल में हसीनों का गुज़र भी
सुहा मुजद्ददी
रोज़ दोहराते थे अफ़्साना-ए-दिल
सूफ़ी तबस्सुम