Couplets Poetry (page 74)

वो तमाशा हूँ हज़ारों मिरे आईने हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

नुमूद उन की भी दौर-ए-सुबू में थी कल रात

सिराजुद्दीन ज़फ़र

हुजूम-ए-गुल में रहे हम हज़ार दस्त दराज़

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ऐ दोस्त इस ज़मान-ओ-मकाँ के अज़ाब में

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ज़र्ब-उल-मसल हैं अब मिरी मुश्किल-पसंदियाँ

सिराज लखनवी

ज़रा देखो ये सरकश ज़र्रा-ए-ख़ाक

सिराज लखनवी

ये ज़मीं ख़ुद हो जन्नतों का सुहाग

सिराज लखनवी

ये जज़्र-ओ-मद है पादाश-ए-अमल इक दिन यक़ीनी है

सिराज लखनवी

ये एक लड़ी के सब छिटके हुए मोती हैं

सिराज लखनवी

ये आधी रात ये काफ़िर अंधेरा

सिराज लखनवी

वो भीड़ है कि ढूँढना तेरा तो दरकिनार

सिराज लखनवी

तुझे पा के तुझ से जुदा हो गए हम

सिराज लखनवी

टकराऊँ क्यूँ ज़माने से क्या फ़ाएदा 'सिराज'

सिराज लखनवी

सोता रहा होंटों पे तबस्सुम का सवेरा

सिराज लखनवी

सज्दा-ए-इश्क़ पे तन्क़ीद न कर ऐ वाइ'ज़

सिराज लखनवी

रात भर शम्अ जलाता हूँ बुझाता हूँ 'सिराज'

सिराज लखनवी

रात भर शम्अ' जलाता हूँ बुझाता हूँ 'सिराज'

सिराज लखनवी

क़फ़स से दूर सही मौसम-ए-बहार तो है

सिराज लखनवी

क़फ़स भी बिगड़ी हुई शक्ल है नशेमन की

सिराज लखनवी

फिर भी पेशानी-ए-तूफ़ाँ पे शिकन बाक़ी है

सिराज लखनवी

नज़्र-ए-ग़म शायद हर अश्क-ए-ख़ूँ-चकाँ करना पड़े

सिराज लखनवी

नमाज़-ए-इश्क़ पढ़ी तो मगर ये होश किसे

सिराज लखनवी

न पी सको तो इधर आओ पोंछ दूँ आँसू

सिराज लखनवी

न मोहतसिब की ख़ुशामद न मय-कदे का तवाफ़

सिराज लखनवी

लहू में डूबी है तारीख़-ए-ख़िल्क़त-ए-इंसाँ

सिराज लखनवी

क्यूँ ध्यान बटाती है मिरा गर्दिश-ए-दुनिया

सिराज लखनवी

कुछ और माँगना मेरे मशरब में कुफ़्र है

सिराज लखनवी

ख़ुशा वो दौर कि जब मरकज़-ए-निगाह थे हम

सिराज लखनवी

ख़ुदा-वंदा ये कैसी सुब्ह-ए-ग़म है

सिराज लखनवी

ख़बर रिहाई की मिल चुकी है चराग़ फूलों के जल रहे हैं

सिराज लखनवी