Couplets Poetry (page 80)

मैं ने हँसने की अज़िय्यत झेल ली रोया नहीं

सिद्दीक़ मुजीबी

मैं वो टूटा हुआ तारा जिसे महफ़िल न रास आई

सिद्दीक़ मुजीबी

ख़ुद पे क्या बीत गई इतने दिनों में तुझ बिन

सिद्दीक़ मुजीबी

हमारे नाम लिखी जा चुकी थी रुस्वाई

सिद्दीक़ मुजीबी

इक लहू की बूँद थी लेकिन कई आँखों में थी

सिद्दीक़ मुजीबी

एक बेचैन समुंदर है मिरे जिस्म में क़ैद

सिद्दीक़ मुजीबी

उस के जाने पे ये एहसास हुआ है 'शाहिद'

सिद्दीक़ शाहिद

निकल आए जो हम घर से तो सौ रस्ते निकल आए

सिद्दीक़ शाहिद

मुझ से कहती हैं वो उदास आँखें

सिद्दीक़ शाहिद

कुछ ऐसे दौर भी ताहम गिरफ़्त में आए

सिद्दीक़ शाहिद

ख़्वाब टूटे पड़े हैं सब मेरे

सिद्दीक़ शाहिद

खुला न उस पे कभी मेरी आँख का मंज़र

सिद्दीक़ शाहिद

बजा है ख़्वाब-नवर्दी प ख़्वाब ऐसे हों

सिद्दीक़ शाहिद

ऐसा कुछ गर्दिश-ए-दौराँ ने रखा है मसरूफ़

सिद्दीक़ शाहिद

जब चली ठंडी हवा बच्चा ठिठुर कर रह गया

सिब्त अली सबा

दीवार क्या गिरी मिरे ख़स्ता मकान की

सिब्त अली सबा

उर्यां न वो नहाया हम्माम हो कि दरिया

शऊर बलगिरामी

क़तील हो के भी मैं अपने क़ातिलों से लड़ा

शुजाअत अली राही

ज़िंदगी भर ज़िंदा रहने की यही तरकीब है

शुजा ख़ावर

ये दुनिया-दारी और इरफ़ान का दावा 'शुजा-ख़ावर'

शुजा ख़ावर

या तो जो ना-फ़हम हैं वो बोलते हैं इन दिनों

शुजा ख़ावर

वस्ल हुआ पर दिल में तमन्ना

शुजा ख़ावर

उस को न ख़याल आए तो हम मुँह से कहें क्या

शुजा ख़ावर

उस के बयान से हुए हर दिल अज़ीज़ हम

शुजा ख़ावर

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

तंहाई का इक और मज़ा लूट रहा हूँ

शुजा ख़ावर

तंगी-ए-हैअत से टकराता हुआ जोश-ए-मवाद

शुजा ख़ावर

'शुजा' वो ख़ैरियत पूछें तो हैरत में न पड़ जाना

शुजा ख़ावर

'शुजा' मौत से पहले ज़रूर जी लेना

शुजा ख़ावर

सातों आलम सर करने के बा'द इक दिन की छुट्टी ले कर

शुजा ख़ावर