Couplets Poetry (page 82)

हम-सफ़र हो तो कोई अपना-सा

शोहरत बुख़ारी

दीवार-ओ-दर पे कृष्ण की लीला के नक़्श हैं

शोभा कुक्कल

ये एक साया ग़नीमत है रोक लो वर्ना

शोएब निज़ाम

तुम्हारे ख़्वाब लौटाने पे शर्मिंदा तो हैं लेकिन

शोएब निज़ाम

मियाँ बाज़ार को शर्मिंदा करना क्या ज़रूरी है

शोएब निज़ाम

मिरी तलाश में वो भी ज़रूर आएगा

शोएब निज़ाम

मिरी तलाश में उस पार लोग जाते हैं

शोएब निज़ाम

क्या ख़त्म न होगी कभी सहरा की हुकूमत

शोएब निज़ाम

किधर डुबो के कहाँ पर उभारता है तू

शोएब निज़ाम

ख़ुद से फ़रार इतना आसान भी नहीं है

शोएब निज़ाम

इतना नूर कहाँ से लाऊँ तारीकी के इस जंगल में

शोएब निज़ाम

ग़ुंचा चटका था कहीं ख़ातिर-ए-बुलबुल के लिए

शोएब बिन अज़ीज़

दोस्ती का दावा क्या आशिक़ी से क्या मतलब

शोएब बिन अज़ीज़

अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में

शोएब बिन अज़ीज़

वो निकले हैं सरापा बन-सँवर कर

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

सुकूँ-अफ़ज़ा बहुत है दर्द-ए-उल्फ़त

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

साथ तेरा रहा नहीं बाक़ी

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

पथराई आँखों में देखो क्या क्या रंग दिखाता आँसू

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

मोहब्बत को बहुत होती है ग़ैरत

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

कोई हम से ख़फ़ा सा लगता है

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

कहीं आँसुओं से लिखा हुआ कहीं आँसुओं से मिटा हुआ

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

हिज्र में यूँ बहते हैं आँसू

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

इक दाइमी सुकूँ की तमन्ना है रात दिन

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

चाहे दीवाना कहें या लोग सौदाई कहें

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

ग़ैर से किया गिला करे कोई

शिफ़ा कजगावन्वी

देखो न ज़ात पात न नाम-ओ-नसब 'शिफ़ा'

शिफ़ा कजगावन्वी

बचपन में शौक़ से जो घरौंदे बनाए थे

शिफ़ा कजगावन्वी

ये नज़्म-ए-आईं ये तर्ज़-ए-बंदिश सुख़नवरी है फ़ुसूँ-गरी है

शिबली नोमानी

तस्ख़ीर-ए-चमन पर नाज़ाँ हैं तज़ईन-ए-चमन तो कर न सके

शिबली नोमानी

मैं रूह-ए-आलम-ए-इम्काँ में शरह-ए-अज़्मत-ए-यज़्दाँ

शिबली नोमानी