Couplets Poetry (page 84)
रुलाएगी मिरी याद उन को मुद्दतों साहब
ज़ौक़
रहता सुख़न से नाम क़यामत तलक है 'ज़ौक़'
ज़ौक़
राहत के वास्ते है मुझे आरज़ू-ए-मर्ग
ज़ौक़
पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'
ज़ौक़
पिला मय आश्कारा हम को किस की साक़िया चोरी
ज़ौक़
फूल तो दो दिन बहार-ए-जाँ-फ़ज़ा दिखला गए
ज़ौक़
फिर मुझे ले चला उधर देखो
ज़ौक़
निकालूँ किस तरह सीने से अपने तीर-ए-जानाँ को
ज़ौक़
नाज़ुक-कलामियाँ मिरी तोड़ें अदू का दिल
ज़ौक़
नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में ऐ 'ज़ौक़'
ज़ौक़
न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब
ज़ौक़
मोअज़्ज़िन मर्हबा बर-वक़्त बोला
ज़ौक़
मिरा घर तेरी मंज़िल गाह हो ऐसे कहाँ तालेअ'
ज़ौक़
मज़कूर तिरी बज़्म में किस का नहीं आता
ज़ौक़
मज़े जो मौत के आशिक़ बयाँ कभू करते
ज़ौक़
मौत ने कर दिया लाचार वगरना इंसाँ
ज़ौक़
मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
ज़ौक़
मालूम जो होता हमें अंजाम-ए-मोहब्बत
ज़ौक़
लेते हैं समर शाख़-ए-समरवर को झुका कर
ज़ौक़
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
ज़ौक़
क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से
ज़ौक़
क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब
ज़ौक़
कितने मुफ़लिस हो गए कितने तवंगर हो गए
ज़ौक़
ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े
ज़ौक़
कल जहाँ से कि उठा लाए थे अहबाब मुझे
ज़ौक़
जो पास-ए-मेहर-ओ-मोहब्बत कहीं यहाँ बिकता
ज़ौक़
जो कहोगे तुम कहेंगे हम भी हाँ यूँ ही सही
ज़ौक़
इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
ज़ौक़
हम रोने पे आ जाएँ तो दरिया ही बहा दें
ज़ौक़
हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
ज़ौक़