Sad Poetry (page 158)

मर्ग-ए-दुश्मन का ज़ियादा तुम से है मुझ को मलाल

दाग़ देहलवी

लीजिए सुनिए अब अफ़्साना-ए-फ़ुर्क़त मुझ से

दाग़ देहलवी

लज़्ज़त-ए-इश्क़ इलाही मिट जाए

दाग़ देहलवी

जो गुज़रते हैं 'दाग़' पर सदमे

दाग़ देहलवी

हो सके क्या अपनी वहशत का इलाज

दाग़ देहलवी

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

दाग़ देहलवी

फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं

दाग़ देहलवी

दुनिया में जानता हूँ कि जन्नत मुझे मिली

दाग़ देहलवी

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

दाग़ देहलवी

दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात

दाग़ देहलवी

चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़

दाग़ देहलवी

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं

दाग़ देहलवी

बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा

दाग़ देहलवी

आती है बात बात मुझे बार बार याद

दाग़ देहलवी

आप का ए'तिबार कौन करे

दाग़ देहलवी

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है

दाग़ देहलवी

उज़्र उन की ज़बान से निकला

दाग़ देहलवी

उस के दर तक किसे रसाई है

दाग़ देहलवी

उस से क्या ख़ाक हम-नशीं बनती

दाग़ देहलवी

उन के इक जाँ-निसार हम भी हैं

दाग़ देहलवी

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था

दाग़ देहलवी

तेरी सूरत को देखता हूँ मैं

दाग़ देहलवी

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

दाग़ देहलवी

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैं

दाग़ देहलवी

साज़ ये कीना-साज़ क्या जानें

दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी

दाग़ देहलवी

क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है

दाग़ देहलवी