Sad Poetry (page 157)
कहानी एक रात की
दानिश फ़राज़ी
शीशे से ज़ियादा नाज़ुक था ये शीशा-ए-दिल जो टूट गया
दानिश फ़राही
न सोचें अहल-ए-ख़िरद मुझ को आज़माने को
दानिश फ़राही
किस क़दर इज़्तिराब है यारो
दानिश फ़राही
हश्र इक गुज़रा है वीराने पे घर होने तक
दानिश फ़राही
दुआ हमारी कभी बा-असर नहीं होती
दानिश फ़राही
रूदाद-ए-शब-ए-ग़म यूँ डरता हूँ सुनाने से
दानिश अलीगढ़ी
अपने दुश्मन को भी ख़ुद बढ़ के लगा लो सीने
दानिश अलीगढ़ी
ज़िंदगी कर गई तूफ़ाँ के हवाले मुझ को
दानिश अलीगढ़ी
ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए
दानिश अलीगढ़ी
वाइज़ तू अगर उन के कूचे से गुज़र जाए
दानिश अलीगढ़ी
क्या ख़बर थी मुन्हरिफ़ अहल-ए-जहाँ हो जाएँगे
दानिश अलीगढ़ी
अगर मैं उन की निगाहों से गिर गया होता
दानिश अलीगढ़ी
एक दिन नक़्श-ए-क़दम पर मिरे बन जाएगी राह
दामोदर ठाकुर ज़की
उन के मिलने का ब-ज़ाहिर तो यक़ीं कोई नहीं
दामोदर ठाकुर ज़की
बुलंद ज़ीस्त का अपनी वक़ार हो न सका
दामोदर ठाकुर ज़की
यूँ मेरे साथ दफ़्न दिल-ए-बे-क़रार हो
दाग़ देहलवी
वो ज़माना भी तुम्हें याद है तुम कहते थे
दाग़ देहलवी
वो दिन गए कि 'दाग़' थी हर दम बुतों की याद
दाग़ देहलवी
वाइज़ बड़ा मज़ा हो अगर यूँ अज़ाब हो
दाग़ देहलवी
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
दाग़ देहलवी
वादा झूटा कर लिया चलिए तसल्ली हो गई
दाग़ देहलवी
उधर शर्म हाइल इधर ख़ौफ़ माने
दाग़ देहलवी
तदबीर से क़िस्मत की बुराई नहीं जाती
दाग़ देहलवी
शिरकत-ए-ग़म भी नहीं चाहती ग़ैरत मेरी
दाग़ देहलवी
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
दाग़ देहलवी
न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का
दाग़ देहलवी
मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
दाग़ देहलवी
मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर
दाग़ देहलवी
मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया
दाग़ देहलवी