Couplets Poetry (page 151)
दिल कलेजे दिमाग़ सीना ओ चश्म
सख़ी लख़नवी
देखो क़लई खुलेगी साफ़ उस की
सख़ी लख़नवी
देखें कहता है ख़ुदा हश्र के दिन
सख़ी लख़नवी
दर्द को गुर्दा तड़पने को जिगर
सख़ी लख़नवी
दफ़्न हम हो चुके तो कहते हैं
सख़ी लख़नवी
चर्ख़ पर बद्र जिस को कहते हैं
सख़ी लख़नवी
बोसा हर वक़्त रुख़ का लेता है
सख़ी लख़नवी
बर्ग-ए-गुल आ मैं तेरे बोसे लूँ
सख़ी लख़नवी
बहुत ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में दिन चढ़ गया
सख़ी लख़नवी
बद्र और महर दो हैं नाम उन के
सख़ी लख़नवी
बात करने में होंट लड़ते हैं
सख़ी लख़नवी
अजी फेंको रक़ीब का नामा
सख़ी लख़नवी
आँखों से पा-ए-यार लगाने की है हवस
सख़ी लख़नवी
रात हिस्सा है मिरी उम्र का जी लेने दे
शख़ावत शमीम
जाँ-ब-लब लम्हा-ए-तस्कीं मिरी क़िस्मत है 'शमीम'
शख़ावत शमीम
ये कैसा हादसा गुज़रा ये कैसा सानेहा बीता
सज्जाद शम्सी
हैं क़हक़हे किसी के किसी की हैं सिसकियाँ
सज्जाद शम्सी
ज़ुल्फ़ें इधर खुलीं अधर आँसू उमँड पड़े
सज्जाद बाक़र रिज़वी
टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर
सज्जाद बाक़र रिज़वी
शहर के आबाद सन्नाटों की वहशत देख कर
सज्जाद बाक़र रिज़वी
सामान-ए-दिल को बे-सर-ओ-सामानियाँ मिलीं
सज्जाद बाक़र रिज़वी
फिरती थी ले के शोरिश-ए-दिल कू-ब-कू हमें
सज्जाद बाक़र रिज़वी
फिर ज़ेहन की गलियों में सदा गूँजी है कोई
सज्जाद बाक़र रिज़वी
पहले चादर की हवस में पाँव फैलाए बहुत
सज्जाद बाक़र रिज़वी
मन धन सब क़ुर्बान किया अब सर का सौदा बाक़ी है
सज्जाद बाक़र रिज़वी
मैं सरगिराँ था हिज्र की रातों के क़र्ज़ से
सज्जाद बाक़र रिज़वी
मैं हम-नफ़साँ जिस्म हूँ वो जाँ की तरह था
सज्जाद बाक़र रिज़वी
क्या क्या न तिरे शौक़ में टूटे हैं यहाँ कुफ़्र
सज्जाद बाक़र रिज़वी
खींचे है मुझे दस्त-ए-जुनूँ दश्त-ए-तलब में
सज्जाद बाक़र रिज़वी
हर रंग हर आहंग मिरे सामने आजिज़
सज्जाद बाक़र रिज़वी