Couplets Poetry (page 150)

'सख़ी' बैठिए हट के कुछ उस के दर से

सख़ी लख़नवी

रुख़ हाथ पे रक्खा न करो वक़्त-ए-तकल्लुम

सख़ी लख़नवी

रंगत उस रुख़ की गुल ने पाई है

सख़ी लख़नवी

रहते काबे में अकेले क्या हम

सख़ी लख़नवी

क़ाफ़िला जाता है साग़र की तरफ़ रिंदों का

सख़ी लख़नवी

पूजना बुत का है ये क्या मज़मून

सख़ी लख़नवी

नज़'अ के दम भी उन्हें हिचकी न आएगी कभी

सख़ी लख़नवी

नक़्द-ए-दिल का बड़ा तक़ाज़ा है

सख़ी लख़नवी

न छोड़ा हिज्र में भी ख़ाना-ए-तन

सख़ी लख़नवी

न आशिक़ हैं ज़माने में न माशूक़

सख़ी लख़नवी

मिरे लाशे को कांधा दे के बोले

सख़ी लख़नवी

मैं तुझे फिर ज़मीं दिखाऊँगा

सख़ी लख़नवी

ली ज़बाँ उस की जो मुँह में हो गया ज़ौक़-ए-नबात

सख़ी लख़नवी

क्यूँ हसीनों की आँखों से न लड़े

सख़ी लख़नवी

क्या आतिश-ए-फ़ुर्क़त ने बुरी पाई है तासीर

सख़ी लख़नवी

की ख़िताबत को गर ख़ुदा समझा

सख़ी लख़नवी

ख़ुदा के पास क्या जाएँगे ज़ाहिद

सख़ी लख़नवी

ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत

सख़ी लख़नवी

कहना मजनूँ से कि कल तेरी तरफ़ आऊँगा

सख़ी लख़नवी

कभी पहुँचेगा दिल उन उँगलियों तक

सख़ी लख़नवी

कअ'बे में सख़्त-कलामी सुन ली

सख़ी लख़नवी

जीतेंगे न हम से बाज़ी-ए-इश्क़

सख़ी लख़नवी

जिस के घर जाते न थे हज़रत-ए-दिल

सख़ी लख़नवी

जाएगी गुलशन तलक उस गुल की आमद की ख़बर

सख़ी लख़नवी

इस तरफ़ बज़्म में हम थे वो थे

सख़ी लख़नवी

हम उन से आज का शिकवा करेंगे

सख़ी लख़नवी

हिचकियाँ आती हैं पर लेते नहीं वो मेरा नाम

सख़ी लख़नवी

हमा-तन हो गए हैं आईना

सख़ी लख़नवी

हैफ़ साबित है जेब ने दामन

सख़ी लख़नवी

एक दो तीन चार पाँच छे सात

सख़ी लख़नवी