Couplets Poetry (page 148)
चली है मौज में काग़ज़ की कश्ती
सलीम अहमद
बुरा लगा मिरे साक़ी को ज़िक्र-ए-तिश्ना-लबी
सलीम अहमद
बार-हा यूँ भी हुआ तेरी मोहब्बत की क़सम
सलीम अहमद
बहुत तवील मिरी दास्तान-ए-ग़म थी मगर
सलीम अहमद
बदन की आग को कहते हैं लोग झूटी आग
सलीम अहमद
और तो क्या दिया बहारों ने
सलीम अहमद
आँसुओं से तू है ख़ाली दर्द से आरी हूँ मैं
सलीम अहमद
आ के अब जंगल में ये उक़्दा खुला
सलीम अहमद
यूँ बाग़बाँ ने मोहर लगा दी ज़बान पर
सलाम संदेलवी
ये तो मालूम है उन तक न सदा पहुँचेगी
सलाम संदेलवी
तीरा-ओ-तार फ़ज़ाओं में जिया हूँ अब तक
सलाम संदेलवी
शबनम ने रो के जी ज़रा हल्का तो कर लिया
सलाम संदेलवी
सौ बार आई होंटों पे झूटी हँसी मगर
सलाम संदेलवी
रह-ए-हयात चमक उठ्ठे कहकशाँ की तरह
सलाम संदेलवी
मुझ को तो ख़ून-ए-दिल ही पीना है
सलाम संदेलवी
मता-ए-ग़म मिरे अश्कों ही तक नहीं महदूद
सलाम संदेलवी
क्या इसी को बहार कहते हैं
सलाम संदेलवी
ख़ुशी के फूल खिले थे तुम्हारे साथ कभी
सलाम संदेलवी
कटेगी कैसे गुल-ए-नौ की ज़िंदगी या-रब
सलाम संदेलवी
हुई सुब्ह जाम खनक उठे हुई शाम नग़्मे बिखर गए
सलाम संदेलवी
हमेशा दूर के जल्वे फ़रेब देते हैं
सलाम संदेलवी
है तिश्ना-लबी लेकिन हम क्यूँ उसे ज़हमत दें
सलाम संदेलवी
गुलों के रूप में बिखरे हैं हर तरफ़ काँटे
सलाम संदेलवी
गुल-ओ-ग़ुंचा अस्ल में हैं तिरी गुफ़्तुगू की शक्लें
सलाम संदेलवी
दिल की धड़कन भी है उन को नागवार
सलाम संदेलवी
चंद तिनकों के सिवा क्या था नशेमन में मिरे
सलाम संदेलवी
बिजली गिरेगी सेहन-ए-चमन में कहाँ कहाँ
सलाम संदेलवी
बहुत उम्मीद थी मंज़िल पे जा कर चैन पाएँगे
सलाम संदेलवी
आए जो चंद तिनके क़फ़स में सबा के साथ
सलाम संदेलवी
यूँ ही आँखों में आ गए आँसू
सलाम मछली शहरी