Couplets Poetry (page 146)

ज़मीं यख़-बस्ता हो जाती है जब जाड़ों की रातों में

सलीम अहमद

ये नहीं है कि नवाज़े न गए हों हम लोग

सलीम अहमद

ये कैसे लोग हैं सदियों की वीरानी में रहते हैं

सलीम अहमद

ये चाहा था कि पत्थर बन के जी लूँ

सलीम अहमद

याद ने आ कर यकायक पर्दा खींचा दूर तक

सलीम अहमद

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

वो जुनूँ को बढ़ाए जाएँगे

सलीम अहमद

वो बे-ख़ुदी थी मोहब्बत की बे-रुख़ी तो न थी

सलीम अहमद

उस एक चेहरे में आबाद थे कई चेहरे

सलीम अहमद

उन को जल्वत की हवस महफ़िल में तन्हा कर गई

सलीम अहमद

तू शीशा बने कि संग कुछ बन

सलीम अहमद

शायद कोई बंदा-ए-ख़ुदा आए

सलीम अहमद

साथ उस के रह सके न बग़ैर उस के रह सके

सलीम अहमद

सख़्त बीवी को शिकायत है जवान-ए-नौ से

सलीम अहमद

सफ़र में इश्क़ के इक ऐसा मरहला आया

सलीम अहमद

साए को साए में गुम होते तो देखा होगा

सलीम अहमद

सच तो कह दूँ मगर इस दौर के इंसानों को

सलीम अहमद

रोज़ काग़ज़ पे बनाता हूँ मैं क़दमों के नुक़ूश

सलीम अहमद

रस्म-ए-जहाँ न छूट सकी तर्क-ए-इश्क़ से

सलीम अहमद

क़ुर्ब-ए-बदन से कम न हुए दिल के फ़ासले

सलीम अहमद

क़िस्सा छेड़ा मेहर ओ वफ़ा का अव्वल-ए-शब उन आँखों ने

सलीम अहमद

निकल गए हैं जो बादल बरसने वाले थे

सलीम अहमद

नहीं रहा मैं तिरे रास्ते का पत्थर भी

सलीम अहमद

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

मुझ से कहता है कि साए की तरह साथ हैं हम

सलीम अहमद

मुझे हर्फ़-ए-ग़लत समझा था तू ने

सलीम अहमद

मुझे गिला न किसी संग का न आहन का

सलीम अहमद

मोहल्ले वाले मेरे कार-ए-बे-मसरफ़ पे हँसते हैं

सलीम अहमद

मेरा शोर-ए-ग़र्क़ाबी ख़त्म हो गया आख़िर

सलीम अहमद

मंज़िल का पता है न किसी राहगुज़र का

सलीम अहमद