Couplets Poetry (page 145)

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से

सलीम कौसर

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

सलीम कौसर

कभी इश्क़ करो और फिर देखो इस आग में जलते रहने से

सलीम कौसर

जुदाई भी न होती ज़िंदगी भी सहल हो जाती

सलीम कौसर

जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को 'सलीम' सुब्ह न मिल सकी

सलीम कौसर

इंतिज़ार और दस्तकों के दरमियाँ कटती है उम्र

सलीम कौसर

हम ने तो ख़ुद से इंतिक़ाम लिया

सलीम कौसर

एक तरफ़ तिरे हुस्न की हैरत एक तरफ़ दुनिया

सलीम कौसर

दुनिया अच्छी भी नहीं लगती हम ऐसों को 'सलीम'

सलीम कौसर

देखते कुछ हैं दिखाते हमें कुछ हैं कि यहाँ

सलीम कौसर

दस्त-ए-दुआ को कासा-ए-साइल समझते हो

सलीम कौसर

भला वो हुस्न किस की दस्तरस में आ सका है

सलीम कौसर

बहुत दिनों में कहीं हिज्र-ए-माह-ओ-साल के बाद

सलीम कौसर

और इस से पहले कि साबित हो जुर्म-ए-ख़ामोशी

सलीम कौसर

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

सलीम कौसर

ऐ मिरे चारागर तिरे बस में नहीं मोआमला

सलीम कौसर

अहल-ए-ख़िरद को आज भी अपने यक़ीन के लिए

सलीम कौसर

अभी हैरत ज़ियादा और उजाला कम रहेगा

सलीम कौसर

अब जो लहर है पल भर बाद नहीं होगी यानी

सलीम कौसर

आईना ख़ुद भी सँवरता था हमारी ख़ातिर

सलीम कौसर

वो चाँद टूट गया जिस से रात रौशन थी

सलीम फ़िगार

शाख़-दर-शाख़ तिरी याद की हरियाली है

सलीम फ़िगार

लफ़्ज़ ले कर ख़याल की वुसअत

सलीम फ़िगार

कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए

सलीम फ़िगार

अँधेरे को निगलता जा रहा हूँ

सलीम फ़िगार

सुकूत बढ़ने लगा है सदा ज़रूरी है

सलीम फ़ौज़

बहुत क़रीब से कुछ भी न देख पाओगे

सलीम फ़ौज़

वो कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है

सलीम बेताब

उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर

सलीम बेताब

मैं ने तो यूँही राख में फेरी थीं उँगलियाँ

सलीम बेताब