Couplets Poetry (page 147)

मैं वो मअ'नी-ए-ग़म-ए-इश्क़ हूँ जिसे हर्फ़ हर्फ़ लिखा गया

सलीम अहमद

मैं तुझ को कितना चाहता हूँ

सलीम अहमद

मैं ग़म को बसा रहा हूँ दिल में

सलीम अहमद

लिबास-ए-दर्द भी हम ने उतारा

सलीम अहमद

कोई नहीं जो पता दे दिलों की हालत का

सलीम अहमद

किसी को क्या बताऊँ कौन हूँ मैं

सलीम अहमद

ख़ुश-नुमा लफ़्ज़ों की रिश्वत दे के राज़ी कीजिए

सलीम अहमद

ख़ुद अपनी दीद से अंधी हैं आँखें

सलीम अहमद

ख़मोशी के हैं आँगन और सन्नाटे की दीवारें

सलीम अहमद

कौन तू है कौन मैं कैसी वफ़ा

सलीम अहमद

कैसे क़िस्से थे कि छिड़ जाएँ तो उड़ जाती थी नींद

सलीम अहमद

जितना आँख से कम देखूँ

सलीम अहमद

जिस आग से दिल सुलग रहे थे

सलीम अहमद

जाने अंदर क्या हुआ मैं शोर सुन कर ऐ 'सलीम'

सलीम अहमद

इतनी काविश भी न कर मेरी असीरी के लिए

सलीम अहमद

हम ने शिकवा कभी किया न करें

सलीम अहमद

हाल-ए-दिल ना-गुफ़्तनी है हम जो कहते भी तो क्या

सलीम अहमद

हाल-ए-दिल कौन सुनाए उसे फ़ुर्सत किस को

सलीम अहमद

हाल मत पूछ मोहब्बत का हवा है कुछ और

सलीम अहमद

घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू

सलीम अहमद

घर में कुछ कम है ये एहसास भी होता है 'सलीम'

सलीम अहमद

इक पतिंगे ने ये अपने रक़्स-ए-आख़िर में कहा

सलीम अहमद

इक आग सी जलती रही ता-उम्र लहू में

सलीम अहमद

दुख दे या रुस्वाई दे

सलीम अहमद

दिल के लेने से 'सलीम' उस को नहीं है इंकार

सलीम अहमद

दिल जो इस बज़्म में आता है तो जाता ही नहीं

सलीम अहमद

दिल हुस्न को दान दे रहा हूँ

सलीम अहमद

देवता बनने की हसरत में मुअल्लक़ हो गए

सलीम अहमद

दश्त ओ दर ख़ैर मनाएँ कि अभी वहशत में

सलीम अहमद

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ

सलीम अहमद