Couplets Poetry (page 149)

वो सिर्फ़ मैं हूँ जो सौ जन्नतें सजा कर भी

सलाम मछली शहरी

वो दिल से तंग आ के आज महफ़िल में हुस्न की तमकनत की ख़ातिर

सलाम मछली शहरी

तुम शराब पी कर भी होश-मंद रहते हो

सलाम मछली शहरी

शुक्रिया ऐ गर्दिश-ए-जाम-ए-शराब

सलाम मछली शहरी

रोज़ पूजा के लिए फूल सजाता है 'सलाम'

सलाम मछली शहरी

रात दिल को था सहर का इंतिज़ार

सलाम मछली शहरी

मेरी मौत ऐ साक़ी इर्तिक़ा है हस्ती का

सलाम मछली शहरी

मेरी फ़िक्र की ख़ुशबू क़ैद हो नहीं सकती

सलाम मछली शहरी

काश तुम समझ सकतीं ज़िंदगी में शाएर की ऐसे दिन भी आते हैं

सलाम मछली शहरी

कभी कभी तो सुना है हिला दिए हैं महल

सलाम मछली शहरी

कभी कभी अर्ज़-ए-ग़म की ख़ातिर हम इक बहाना भी चाहते हैं

सलाम मछली शहरी

ग़म मुसलसल हो तो अहबाब बिछड़ जाते हैं

सलाम मछली शहरी

बुझ गई कुछ इस तरह शम्-ए-'सलाम'

सलाम मछली शहरी

अजीब बात है मैं जब भी कुछ उदास हुआ

सलाम मछली शहरी

ऐ मिरे घर की फ़ज़ाओं से गुरेज़ाँ महताब

सलाम मछली शहरी

अब मा-हसल हयात का बस ये है ऐ 'सलाम'

सलाम मछली शहरी

आँसू हूँ हँस रहा हूँ शगूफ़ों के दरमियाँ

सलाम मछली शहरी

आज तो शम्अ हवाओं से ये कहती है 'सलाम'

सलाम मछली शहरी

आवाज़ों से जिस्म हुआ नम

सलाहुद्दीन महमूद

ज़िंदगी तक मिरी हँस लीजिए आप

सख़ी लख़नवी

यूँही वादा करो यक़ीं हो जाए

सख़ी लख़नवी

वो आशिक़ हैं कि मरने पर हमारे

सख़ी लख़नवी

तुम न आसान को आसाँ समझो

सख़ी लख़नवी

तीस दिन यार अब न आएगा

सख़ी लख़नवी

था मिरा नाख़ुन-ए-तराशीदा

सख़ी लख़नवी

था हिना से जो शोख़ मेरा ख़ूँ

सख़ी लख़नवी

तस्वीर-ए-चश्म-ए-यार का ख़्वाहाँ है बाग़बाँ

सख़ी लख़नवी

सीने से हमारा दिल न ले जाओ

सख़ी लख़नवी

शम्अ को रौशनी का अपने बहुत दावा है

सख़ी लख़नवी

शैख़-जी बुत की बुराई कीजे

सख़ी लख़नवी