Couplets Poetry (page 143)

धुआँ देता है दामान-ए-मोहब्बत

सालिक लखनवी

चाहा था ठोकरों में गुज़र जाए ज़िंदगी

सालिक लखनवी

बहार-ए-गुलिस्ताँ हम को न पहचाने तअज्जुब है

सालिक लखनवी

अपनी ख़ुद्दारी सलामत दिल का आलम कुछ सही

सालिक लखनवी

आज भी है वही मक़ाम आज भी लब पे उन का नाम

सालिक लखनवी

नहीं इक बार भी अब सुनने की ताक़त दिल में

सालिक देहलवी

ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म सुख़न और भी होता है वसीअ

सलीम सिद्दीक़ी

उम्र भर जिस के लिए पेट से बाँधे पत्थर

सलीम सिद्दीक़ी

ख़ौफ़ आँखों में मिरी देख के चिंगारी का

सलीम सिद्दीक़ी

ख़रीदने के लिए उस को बिक गया ख़ुद ही

सलीम सिद्दीक़ी

कौन सा जुर्म ख़ुदा जाने हुआ है साबित

सलीम सिद्दीक़ी

कज-कुलाही पे न मग़रूर हुआ कर इतना

सलीम सिद्दीक़ी

हूँ पारसा तिरे पहलू में शब गुज़ार के भी

सलीम सिद्दीक़ी

हम आदमी की तरह जी रहे हैं सदियों से

सलीम सिद्दीक़ी

इक एक हर्फ़ की रखनी है आबरू मुझ को

सलीम सिद्दीक़ी

इक धुँदलका हूँ ज़रा देर में छट जाऊँगा

सलीम सिद्दीक़ी

बेड़ियाँ डाल के परछाईं की पैरों में मिरे

सलीम सिद्दीक़ी

अपने जीने के हम अस्बाब दिखाते हैं तुम्हें

सलीम सिद्दीक़ी

अब ज़मीनों को बिछाए कि फ़लक को ओढ़े

सलीम सिद्दीक़ी

आज रक्खे हैं क़दम उस ने मिरी चौखट पर

सलीम सिद्दीक़ी

आज फिर अपनी समाअत सौंप दी उस ने हमें

सलीम सिद्दीक़ी

बड़ी ही अँधेरी डगर है मियाँ

सलीम शीराज़ी

ज़र्द पत्ते में कोई नुक़्ता-ए-सब्ज़

सलीम शहज़ाद

वहम ओ ख़िरद के मारे हैं शायद सब लोग

सलीम शहज़ाद

उसे पता है कि रुकती नहीं है छाँव कभी

सलीम शहज़ाद

कब तक इन आवारा मौजों का तमाशा देखना

सलीम शहज़ाद

हवा की ज़द में पत्ते की तरह था

सलीम शहज़ाद

बातों में है उस की ज़हर थोड़ा

सलीम शहज़ाद

अन-कही कह अन-सुनी बातें सुना

सलीम शहज़ाद

आग भी बरसी दरख़्तों पर वहीं

सलीम शहज़ाद