Couplets Poetry (page 141)
क्या नहीं जानता मुझे कोई
सलमान अख़्तर
कुछ तो मैं भी डरा डरा सा था
सलमान अख़्तर
कुछ तो अपने लिए भी रखना है
सलमान अख़्तर
कोई शय एक सी नहीं रहती
सलमान अख़्तर
ख़ाली बरामदों ने मुझे देख कर कहा
सलमान अख़्तर
कैसे हो क्या है हाल मत पूछो
सलमान अख़्तर
जिस से सारे चराग़ जलते थे
सलमान अख़्तर
झूटी उम्मीद की उँगली को पकड़ना छोड़ो
सलमान अख़्तर
झाँकते रात के गरेबाँ से
सलमान अख़्तर
जब ये माना कि दिल में डर है बहुत
सलमान अख़्तर
हम जो पहले कहीं मिले होते
सलमान अख़्तर
हज़ार चाहें मगर छूट ही नहीं सकती
सलमान अख़्तर
गुफ़्तुगू तीर सी लगी दिल में
सलमान अख़्तर
इक वही शख़्स मुझ को याद रहा
सलमान अख़्तर
देखे जो मेरी नेकी को शक की निगाह से
सलमान अख़्तर
चाँद सूरज की तरह तुम भी हो क़ुदरत का खेल
सलमान अख़्तर
बुत समझते थे जिस को सारे लोग
सलमान अख़्तर
अपनी आदत कि सब से सब कह दें
सलमान अख़्तर
ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत न हो मगर
सलमान अख़्तर
ज़िंदगी ने जो कहीं का नहीं रक्खा मुझ को
सालिम सलीम
ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से
सालिम सलीम
वो दूर था तो बहुत हसरतें थीं पाने की
सालिम सलीम
तुम्हारी आग में ख़ुद को जलाया था जो इक शब
सालिम सलीम
तमाम बिछड़े हुओं को मिलाओ आज की रात
सालिम सलीम
न जाने कैसी गिरानी उठाए फिरता हूँ
सालिम सलीम
मेरी मिट्टी में कोई आग सी लग जाती है
सालिम सलीम
मैं घटता जा रहा हूँ अपने अंदर
सालिम सलीम
मैं आप अपने अंधेरों में बैठ जाता हूँ
सालिम सलीम
क्या हो गया कि बैठ गई ख़ाक भी मिरी
सालिम सलीम
कितना मुश्किल हो गया हूँ हिज्र में उस के सो वो
सालिम सलीम