Couplets Poetry (page 140)
अजब कि सब्र की मीआद बढ़ती जाती है
साक़ी फ़ारुक़ी
अभी नज़र में ठहर ध्यान से उतर के न जा
साक़ी फ़ारुक़ी
अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
साक़ी फ़ारुक़ी
आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो
साक़ी फ़ारुक़ी
ज़िंदगी भर मुझे इस बात की हसरत ही रही
साक़ी अमरोहवी
तू नहीं तो तिरा ख़याल सही
साक़ी अमरोहवी
मुझ को क्या क्या न दुख मिले 'साक़ी'
साक़ी अमरोहवी
में अब तक दिन के हंगामों में गुम था
साक़ी अमरोहवी
मदरसा मेरा मेरी ज़ात में है
साक़ी अमरोहवी
कितने ही ग़म निखरने लगते हैं
साक़ी अमरोहवी
ख़्वाब था या शबाब था मेरा
साक़ी अमरोहवी
दर-ब-दर होने से पहले कभी सोचा भी न था
साक़ी अमरोहवी
शायद सवाब तुम को भी मिल जाए सब के साथ
संदीप कोल नादिम
कैसे इस बात पर यक़ीं कर लूँ
संदीप कोल नादिम
उँगलियाँ घिस गईं याँ हाथों को मलते मलते
सनाउल्लाह फ़िराक़
दिल थामता कि चश्म पे करता तिरी निगाह
सनाउल्लाह फ़िराक़
आना ये हिचकियों का मुझे बे-सबब नहीं
सनाउल्लाह फ़िराक़
शाएरी झूट सही इश्क़ फ़साना ही सही
समीना राजा
सफ़र की शाम सितारा नसीब का जागा
समीना राजा
क्या करें आँख अगर उस से सिवा चाहती है
समीना राजा
आब-ए-हैराँ पर किसी का अक्स जैसे जम गया
समीना राजा
कैसे कैसे रंग हैं तन्हाई की तस्वीर में
सलमान सिद्दीक़ी
ज़िंदगी इस क़दर कठिन क्यूँ है
सलमान अख़्तर
ज़िंदगी हम से तो इस दर्जा तग़ाफ़ुल न बरत
सलमान अख़्तर
ये तमन्ना है कि अब और तमन्ना न करें
सलमान अख़्तर
ये अलग बात कि वो मुझ से ख़फ़ा रहता है
सलमान अख़्तर
वो एक ख़्वाब जो फिर लौट कर नहीं आया
सलमान अख़्तर
वो भी हमारे नाम से बेगाने हो गए
सलमान अख़्तर
निकले थे दोनों भेस बदल के तो क्या अजब
सलमान अख़्तर
मुझे ख़बर न थी इस घर में कितने कमरे हैं
सलमान अख़्तर