Couplets Poetry (page 142)

जुज़ हमारे कौन आख़िर देखता इस काम को

सालिम सलीम

जो एक दम में तमाम रूहों को ख़ाक कर दे

सालिम सलीम

हिज्र के दिन तो हुए ख़त्म बड़ी धूम के साथ

सालिम सलीम

इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर

सालिम सलीम

चराग़-ए-इश्क़ बदन से लगा था कुछ ऐसा

सालिम सलीम

बुझा रखे हैं ये किस ने सभी चराग़-ए-हवस

सालिम सलीम

भरे बाज़ार में बैठा हूँ लिए जिंस-ए-वजूद

सालिम सलीम

अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे

सालिम सलीम

अब इस के बाद कुछ भी नहीं इख़्तियार में

सालिम सलीम

आ रहा होगा वो दामन से हवा बाँधे हुए

सालिम सलीम

मैं रोऊँ तो दर-ओ-दीवार मुझ पर हँसने लगते हैं

सलीम साग़र

ज़िंदाँ में आचानक है ये क्या शोर-ए-सलासिल

सालिक लखनवी

यूँही इंसानों के शहरों में मिला अपना वजूद

सालिक लखनवी

ये भी इक रात कट ही जाएगी

सालिक लखनवी

सितारे की तरह सीने में दिल डूबा किया लेकिन

सालिक लखनवी

साहिल पे क़ैद लाखों सफ़ीनों के वास्ते

सालिक लखनवी

निगाह-ए-शौक़ से लाखों बना डाले हैं दर हम ने

सालिक लखनवी

निगाह-ए-मेहर कहाँ की वो बरहमी भी गई

सालिक लखनवी

नज़र से देख तो साक़ी इक आईना बनाया है

सालिक लखनवी

नाख़ुदा डूबने वालों की तरफ़ मुड़ के न देख

सालिक लखनवी

मिट चुके जो भी थे तौबा-शिकनी के अस्बाब

सालिक लखनवी

मंज़िल न मिली कश्मकश-ए-अहल-ए-नज़र में

सालिक लखनवी

माल-ओ-ज़र अहल-ए-दुवल सामने यूँ गिनते हैं

सालिक लखनवी

मय-ख़ाना-ए-हस्ती में साक़ी हम दोनों ही मुजरिम हैं शायद

सालिक लखनवी

महव यूँ हो गए अल्फ़ाज़-ए-दुआ वक़्त-ए-दुआ

सालिक लखनवी

खींच भी लीजिए अच्छा तो है तस्वीर-ए-जुनूँ

सालिक लखनवी

खनक जाते हैं जब साग़र तो पहरों कान बजते हैं

सालिक लखनवी

कही किसी से न रूदाद-ए-ज़िंदगी मैं ने

सालिक लखनवी

जो तेरी बज़्म से उट्ठा वो इस तरह उट्ठा

सालिक लखनवी

दिल ने सीने में कुछ क़रार लिया

सालिक लखनवी