Couplets Poetry (page 139)
मुझे गुनाह में अपना सुराग़ मिलता है
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझ में सात समुंदर शोर मचाते हैं
साक़ी फ़ारुक़ी
मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था
साक़ी फ़ारुक़ी
मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का
साक़ी फ़ारुक़ी
मेरी अय्यार निगाहों से वफ़ा माँगता है
साक़ी फ़ारुक़ी
मेरी आँखों में अनोखे जुर्म की तज्वीज़ थी
साक़ी फ़ारुक़ी
मेरे अंदर उसे खोने की तमन्ना क्यूँ है
साक़ी फ़ारुक़ी
मिरा अकेला ख़ुदा याद आ रहा है मुझे
साक़ी फ़ारुक़ी
मैं ने चाहा था कि अश्कों का तमाशा देखूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता
साक़ी फ़ारुक़ी
मैं तो ख़ुदा के साथ वफ़ादार भी रहा
साक़ी फ़ारुक़ी
मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला
साक़ी फ़ारुक़ी
मैं अपनी आँखों से अपना ज़वाल देखता हूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
मैं अपने शहर से मायूस हो के लौट आया
साक़ी फ़ारुक़ी
मगर उन सीपियों में पानियों का शोर कैसा था
साक़ी फ़ारुक़ी
लोग लम्हों में ज़िंदा रहते हैं
साक़ी फ़ारुक़ी
ख़ुदा के वास्ते मौक़ा न दे शिकायत का
साक़ी फ़ारुक़ी
ख़ामुशी छेड़ रही है कोई नौहा अपना
साक़ी फ़ारुक़ी
ख़ाक मैं उस की जुदाई में परेशान फिरूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
जिस की हवस के वास्ते दुनिया हुई अज़ीज़
साक़ी फ़ारुक़ी
हम तंगना-ए-हिज्र से बाहर नहीं गए
साक़ी फ़ारुक़ी
हैरानी में हूँ आख़िर किस की परछाईं हूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
हादसा ये है कि हम जाँ न मोअत्तर कर पाए
साक़ी फ़ारुक़ी
हद-बंदी-ए-ख़िज़ाँ से हिसार-ए-बहार तक
साक़ी फ़ारुक़ी
इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते
साक़ी फ़ारुक़ी
एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए
साक़ी फ़ारुक़ी
दुनिया पे अपने इल्म की परछाइयाँ न डाल
साक़ी फ़ारुक़ी
डूब जाने का सलीक़ा नहीं आया वर्ना
साक़ी फ़ारुक़ी
दिल ही अय्यार है बे-वज्ह धड़क उठता है
साक़ी फ़ारुक़ी
बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई
साक़ी फ़ारुक़ी