Couplets Poetry (page 138)
दीदा-ए-दोस्त तिरी चश्म-नुमाई की क़सम
साक़िब लखनवी
चल ऐ हम-दम ज़रा साज़-ए-तरब की छेड़ भी सुन लें
साक़िब लखनवी
बू-ए-गुल फूलों में रहती थी मगर रह न सकी
साक़िब लखनवी
बला से हो पामाल सारा ज़माना
साक़िब लखनवी
बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे
साक़िब लखनवी
अपने दिल-ए-बेताब से मैं ख़ुद हूँ परेशाँ
साक़िब लखनवी
आप उठ रहे हैं क्यूँ मिरे आज़ार देख कर
साक़िब लखनवी
आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ
साक़िब लखनवी
ये क्या तिलिस्म है क्यूँ रात भर सिसकता हूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
ये कैसी बात हुई है कि देख कर ख़ुश है
साक़ी फ़ारुक़ी
वो मिरी रूह की उलझन का सबब जानता है
साक़ी फ़ारुक़ी
वो ख़ुदा है तो मिरी रूह में इक़रार करे
साक़ी फ़ारुक़ी
वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है
साक़ी फ़ारुक़ी
वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है
साक़ी फ़ारुक़ी
उस के वारिस नज़र नहीं आए
साक़ी फ़ारुक़ी
तुम और किसी के हो तो हम और किसी के
साक़ी फ़ारुक़ी
तुझ से मिलने का रास्ता बस एक
साक़ी फ़ारुक़ी
तू जान-ए-मोहब्बत है मगर तेरी तरफ़ भी
साक़ी फ़ारुक़ी
तेरे चेहरे पे उजाले की सख़ावत ऐसी
साक़ी फ़ारुक़ी
तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में
साक़ी फ़ारुक़ी
सुब्ह तक रात की ज़ंजीर पिघल जाएगी
साक़ी फ़ारुक़ी
रूह में रेंगती रहती है गुनह की ख़्वाहिश
साक़ी फ़ारुक़ी
रास्ता दे कि मोहब्बत में बदन शामिल है
साक़ी फ़ारुक़ी
क़त्ल करने का इरादा है मगर सोचता हूँ
साक़ी फ़ारुक़ी
प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर
साक़ी फ़ारुक़ी
नामों का इक हुजूम सही मेरे आस-पास
साक़ी फ़ारुक़ी
नए चराग़ जला याद के ख़राबे में
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझे समझने की कोशिश न की मोहब्बत ने
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा
साक़ी फ़ारुक़ी