Couplets Poetry (page 136)

बादशाहत के मज़े हैं ख़ाकसारी में 'सलीम'

सरदार सलीम

आज दीवाने का ज़ौक़-ए-दीद पूरा हो गया

सरदार सलीम

ज़ाहिद नमाज़ भूला इधर देख कर तुझे

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ज़ाहिद मिरी समझ में तो दोनों गुनाह हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

तुम जाओ रक़ीबों का करो कोई मुदावा

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

तिरा आना मिरे घर हो गया घर ग़ैर के जाना

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

शैख़ चल तू शराब-ख़ाने में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

पीते हैं जो शराब मस्जिद में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

फाड़ कर ख़त उस ने क़ासिद से कहा

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

न चलो मुझ से तुम रक़ीबो चाल

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

मज़ा देखा किसी को ऐ परी-रू मुँह लगाने का

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

लटकते देखा सीने पर जो तेरे तार-ए-गेसू को

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

किस से दूँ तश्बीह मैं ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल को तिरी

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

खोला दरवाज़ा समझ कर मुझ को ग़ैर

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ख़याल-ए-नाफ़ में ज़ुल्फ़ों ने मुश्कीं बाँध दीं मेरी

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

काली घटा कब आएगी फ़स्ल-ए-बहार में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

काबा को अगर मानें कि अल्लाह का घर है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

जो मुँह से कहते हैं कुछ और करते हैं कुछ और

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

जब बोसा ले के मुद्दआ' मैं ने बयाँ किया

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

हैं वही इंसाँ उठाते रंज जो होते ही कज

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

गो हम शराब पीते हमेशा हैं दे के नक़्द

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

गरेबाँ हम ने दिखलाया उन्हों ने ज़ुल्फ़ दिखलाई

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

एक मुद्दत में बढ़ाया तू ने रब्त

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

धर के हाथ अपना जिगर पर मैं वहीं बैठ गया

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

डराएगी हमें क्या हिज्र की अँधेरी रात

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

चाहने वालों को चाहा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

भूल कर ले गया सू-ए-मंज़िल

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ऐ शैख़ ये जो मानें का'बा ख़ुदा का घर है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ऐ शैख़ अपना जुब्बा-ए-अक़्दस सँभालिये

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

आशिक़-मिज़ाज रहते हैं हर वक़्त ताक में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी