Couplets Poetry (page 134)

रौनक़-ए-बज़्म नहीं था कोई तुझ से पहले

सरफ़राज़ ख़ालिद

पानियों में खेल कुछ ऐसा भी होना चाहिए था

सरफ़राज़ ख़ालिद

पैरों से बाँध लेता हूँ पिछली मसाफ़तें

सरफ़राज़ ख़ालिद

न रात बाक़ी है कोई न ख़्वाब बाक़ी है

सरफ़राज़ ख़ालिद

न चाँद का न सितारों न आफ़्ताब का है

सरफ़राज़ ख़ालिद

मिलते हो तो अब तुम भी बहुत रहते हो ख़ामोश

सरफ़राज़ ख़ालिद

मिरे मरने का ग़म तो बे-सबब होगा कि अब के बार

सरफ़राज़ ख़ालिद

मौसम कोई भी हो पे बदलता नहीं हूँ मैं

सरफ़राज़ ख़ालिद

मैं तो अब शहर में हूँ और कोई रात गए

सरफ़राज़ ख़ालिद

मैं जिस को सोचता रहता हूँ क्या है वो आख़िर

सरफ़राज़ ख़ालिद

मैं अपने-आप से आगे निकल गया हूँ बहुत

सरफ़राज़ ख़ालिद

लम्बी है बहुत आज की शब जागने वालो

सरफ़राज़ ख़ालिद

किसी ने जाँ ही लुटा दी वफ़ाओं की ख़ातिर

सरफ़राज़ ख़ालिद

ख़्वाब मैले हो गए थे उन को धोना चाहिए था

सरफ़राज़ ख़ालिद

जो तुम कहते हो मुझ से पहले तुम आए थे महफ़िल में

सरफ़राज़ ख़ालिद

इब्तिदा उस ने ही की थी मिरी रुस्वाई की

सरफ़राज़ ख़ालिद

हम किसी और वक़्त के हैं असीर

सरफ़राज़ ख़ालिद

होश जाता रहा दुनिया की ख़बर ही न रही

सरफ़राज़ ख़ालिद

हमारे काँधे पे इस बार सिर्फ़ आँखें हैं

सरफ़राज़ ख़ालिद

इक तू ने ही नहीं की जुनूँ की दुकान बंद

सरफ़राज़ ख़ालिद

एक दिन उस की निगाहों से भी गिर जाएँगे

सरफ़राज़ ख़ालिद

दिल जो टूटा है तो फिर याद नहीं है कोई

सरफ़राज़ ख़ालिद

देर तक जागते रहने का सबब याद आया

सरफ़राज़ ख़ालिद

बात तो ये है कि वो घर से निकलता भी नहीं

सरफ़राज़ ख़ालिद

बादा-ओ-जाम के रहे ही नहीं

सरफ़राज़ ख़ालिद

अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँ

सरफ़राज़ ख़ालिद

अजीब फ़ुर्सत-ए-आवारगी मिली है मुझे

सरफ़राज़ ख़ालिद

अब मुझ में कोई बात नई ढूँढने वालो

सरफ़राज़ ख़ालिद

अब जिस्म के अंदर से आवाज़ नहीं आती

सरफ़राज़ ख़ालिद

आँखों ने बनाई थी कोई ख़्वाब की तस्वीर

सरफ़राज़ ख़ालिद