Couplets Poetry (page 132)

मिलना और बिछड़ जाना किसी रस्ते पर

सरवत हुसैन

मिरे सीने में दिल है या कोई शहज़ादा-ए-ख़ुद-सर

सरवत हुसैन

मौत के दरिंदे में इक कशिश तो है 'सरवत'

सरवत हुसैन

मैं सो रहा था और मिरी ख़्वाब-गाह में

सरवत हुसैन

मैं किताब-ए-ख़ाक खोलूँ तो खुले

सरवत हुसैन

मैं आग देखता था आग से जुदा कर के

सरवत हुसैन

ले आएगा इक रोज़ गुल ओ बर्ग भी 'सरवत'

सरवत हुसैन

ख़ुश-लिबासी है बड़ी चीज़ मगर क्या कीजे

सरवत हुसैन

जिसे अंजाम तुम समझती हो

सरवत हुसैन

हुस्न-ए-बहार मुझ को मुकम्मल नहीं लगा

सरवत हुसैन

इक दास्तान अब भी सुनाते हैं फ़र्श ओ बाम

सरवत हुसैन

दो ही चीज़ें इस धरती में देखने वाली हैं

सरवत हुसैन

दश्त छोड़ा तो क्या मिला 'सरवत'

सरवत हुसैन

बुझी रूह की प्यास लेकिन सख़ी

सरवत हुसैन

बहुत मुसिर थे ख़ुदायान-ए-साबित-ओ-सय्यार

सरवत हुसैन

अपने लिए तज्वीज़ की शमशीर-ए-बरहना

सरवत हुसैन

अपने अपने घर जा कर सुख की नींद सो जाएँ

सरवत हुसैन

आँखों में दमक उट्ठी है तस्वीर-ए-दर-ओ-बाम

सरवत हुसैन

आते जाते मौसमों का सिलसिला बाक़ी रहे

सरवर उस्मानी

उजड़े हैं कई शहर, तो ये शहर बसा है

सरशार सिद्दीक़ी

'सरशार' मैं ने इश्क़ के मअ'नी बदल दिए

सरशार सिद्दीक़ी

नींद टूटी है तो एहसास-ए-ज़ियाँ भी जागा

सरशार सिद्दीक़ी

ना-मुस्तजाब इतनी दुआएँ हुईं कि फिर

सरशार सिद्दीक़ी

मिरी तलब में तकल्लुफ़ भी इंकिसार भी था

सरशार सिद्दीक़ी

मैं ने इबादतों को मोहब्बत बना दिया

सरशार सिद्दीक़ी

इक कार-ए-मुहाल कर रहा हूँ

सरशार सिद्दीक़ी

चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है

सरशार सैलानी

उस के मिलने पे भी महसूस हुआ है 'सरमद'

सरमद सहबाई

उस के जाने का यक़ीं तो है मगर उलझन में हूँ

सरमद सहबाई

सब की अपनी मंज़िलें थीं सब के अपने रास्ते

सरमद सहबाई