Couplets Poetry (page 130)
समझ लिया था तुझे दोस्त हम ने धोके में
सऊद उस्मानी
पक्का रस्ता कच्ची सड़क और फिर पगडंडी
सऊद उस्मानी
नज़र तो अपने मनाज़िर के रम्ज़ जानती है
सऊद उस्मानी
मिज़ाज-ए-दर्द को सब लफ़्ज़ भी क़ुबूल न थे
सऊद उस्मानी
मैं चाहता हूँ उसे और चाहने के सिवा
सऊद उस्मानी
कुछ और भी दरकार था सब कुछ के अलावा
सऊद उस्मानी
किसी अलाव का शोला भड़क के बोलता है
सऊद उस्मानी
ख़्वाहिश है कि ख़ुद को भी कभी दूर से देखूँ
सऊद उस्मानी
इतनी सियाह-रात में इतनी सी रौशनी
सऊद उस्मानी
हर शय से पलट रही हैं नज़रें
सऊद उस्मानी
हर इक उफ़ुक़ पे मुसलसल तुलूअ होता हुआ
सऊद उस्मानी
हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को
सऊद उस्मानी
बरून-ए-ख़ाक फ़क़त चंद ठेकरे हैं मगर
सऊद उस्मानी
बहुत दिनों में मिरे घर की ख़ामोशी टूटी
सऊद उस्मानी
ऐसा है कि सिक्कों की तरह मुल्क-ए-सुख़न में
सऊद उस्मानी
आख़िर इक रोज़ उतरनी है लिबादों की तरह
सऊद उस्मानी
यूँ एहतिमाम-ए-रद्द-ए-सहर कर दिया गया
सत्तार सय्यद
शायद अब ख़त्म हुआ चाहता है अहद-ए-सुकूत
सत्तार सय्यद
समुंदरों को सिखाता है कौन तर्ज़-ए-ख़िराम
सत्तार सय्यद
सहर को साथ उड़ा ले गई सबा जैसे
सत्तार सय्यद
लहू में फूल खिलाने कहाँ से आते हैं
सत्तार सय्यद
कब बन-बास कटे इस शहर के लोगों का
सत्तार सय्यद
वक़्त भी अब मिरा मरहम नहीं होने पाता
सरवत ज़ेहरा
तुम्हारी आस की चादर से मुँह छुपाए हुए
सरवत ज़ेहरा
मिरे जज़्बों को ये लफ़्ज़ों की बंदिश मार देती है
सरवत ज़ेहरा
कोई जवाज़ ढूँडते ख़याल ही नहीं रहा
सरवत ज़ेहरा
ख़्वाब और तमन्ना का क्या हिसाब रखना है
सरवत ज़ेहरा
कैसे बुझाएँ कौन बुझाए बुझे भी क्यूँ
सरवत ज़ेहरा
कहाँ पे खोलोगे दर्द अपना किसे कहोगे
सरवत ज़ेहरा
जो सारा दिन मिरे ख़्वाबों को रेज़ा रेज़ा करते हैं
सरवत ज़ेहरा