Couplets Poetry (page 133)
सुना है कोई दीवाना यहाँ पर
सरफ़राज़ ज़ाहिद
साल गुज़र जाता है सारा
सरफ़राज़ ज़ाहिद
इक अदावत से फ़राग़त नहीं मिलती वर्ना
सरफ़राज़ ज़ाहिद
वो कोई आम सा ही जुमला था
सरफ़राज़ नवाज़
तुम्हारे सच की हिफ़ाज़त में यूँ हुआ अक्सर
सरफ़राज़ नवाज़
सफ़र कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया मेरा
सरफ़राज़ नवाज़
मिरे बग़ैर कोई तुम को ढूँडता कैसे
सरफ़राज़ नवाज़
कितना दुश्वार है इक लम्हा भी अपना होना
सरफ़राज़ नवाज़
ख़ुदा करे कि वही बात उस के दिल में हो
सरफ़राज़ नवाज़
इश्क़ अदब है तो अपने आप आए
सरफ़राज़ नवाज़
हम अपने शहर से हो कर उदास आए थे
सरफ़राज़ नवाज़
बे-सदा सी किसी आवाज़ के पीछे पीछे
सरफ़राज़ नवाज़
बदन-सराए में ठहरा हुआ मुसाफ़िर हूँ
सरफ़राज़ नवाज़
आईना चुपके से मंज़र वो चुरा लेता है
सरफ़राज़ नवाज़
ज़ीस्त की यकसानियत से तंग आ जाते हैं सब
सरफ़राज़ ख़ालिद
ये काएनात भी क्या क़ैद-ख़ाना है कोई
सरफ़राज़ ख़ालिद
वो मुज़्तरिब था बहुत मुझ को दरमियाँ कर के
सरफ़राज़ ख़ालिद
वो चेहरा मुझे साफ़ दिखाई नहीं देता
सरफ़राज़ ख़ालिद
वो भी न आया उम्र-ए-गुज़िश्ता के मिस्ल ही
सरफ़राज़ ख़ालिद
उसी से पूछो उसे नींद क्यूँ नहीं आती
सरफ़राज़ ख़ालिद
उसी के ख़्वाब थे सारे उसी को सौंप दिए
सरफ़राज़ ख़ालिद
उस से कह दो कि मुझे उस से नहीं मिलना है
सरफ़राज़ ख़ालिद
तुम थे तो हर इक दर्द तुम्हीं से था इबारत
सरफ़राज़ ख़ालिद
तो देखें और किसी को जो वो नहीं मौजूद
सरफ़राज़ ख़ालिद
तिरी दुआएँ भी शामिल हैं कोशिशों में मिरी
सरफ़राज़ ख़ालिद
तमाम उम्र ब-क़ैद-ए-सफ़र रहा हूँ मैं
सरफ़राज़ ख़ालिद
सुनते हैं बयाबाँ भी कभी शहर रहा था
सरफ़राज़ ख़ालिद
सियाह रात के पहलू में जिस्म के अंदर
सरफ़राज़ ख़ालिद
सितम किए हैं तो क्या तुझ से है हयात मिरी
सरफ़राज़ ख़ालिद
शरीक वो भी रहा काविश-ए-मोहब्बत में
सरफ़राज़ ख़ालिद