Couplets Poetry (page 137)
आगे मेरे न तीखी मार ऐ शैख़
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
हर-चंद शेर ओ शौक़ की बुनियाद है जुनूँ
सरदार अयाग़
ये कैसे मरहले में फँस गया है मेरा घर मालिक
सदार आसिफ़
ये बात सच है कि वो ज़िंदगी नहीं मेरी
सदार आसिफ़
सुना है धूप को घर लौटने की जल्दी है
सदार आसिफ़
मैं तुझ से झुक के मिला हूँ मगर ये ध्यान रहे
सदार आसिफ़
मैं ख़ुद को देखूँ अगर दूसरे की आँखों से
सदार आसिफ़
कोई शिकवा नहीं हम को किसी से
सदार आसिफ़
ख़ता उस की मुआफ़ी से बड़ी है
सदार आसिफ़
ख़त हो कोई किताब हो या दिल का ज़ख़्म हो
सदार आसिफ़
हो लेने दो बारिश हम भी रो लेंगे
सदार आसिफ़
ग़ज़ल कहने में यूँ तो कोई दुश्वारी नहीं होती
सदार आसिफ़
आता रहा हूँ याद मैं उस को तमाम उम्र
सदार आसिफ़
आसमाँ तू ने छुपा रक्खा है सूरज को कहाँ
सदार आसिफ़
ज़िंदगी इक इम्तिहाँ है इम्तिहाँ का डर नहीं
सरदार अंजुम
वो मोड़ जिस ने हमें अजनबी बना डाला
सरदार अंजुम
सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा
सरदार अंजुम
कभी कभी तू मुझे याद कर तो लेती है
सरदार अंजुम
ग़मों ने घेर लिया है मुझे तो क्या ग़म है
सरदार अंजुम
ग़म-ए-हयात का झगड़ा मिटा रहा है कोई
सरदार अंजुम
चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएँ
सरदार अंजुम
ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
साक़िब लखनवी
उस के सुनने के लिए जम'अ हुआ है महशर
साक़िब लखनवी
सुनने वाले रो दिए सुन कर मरीज़-ए-ग़म का हाल
साक़िब लखनवी
सोने वालों को क्या ख़बर ऐ हिज्र
साक़िब लखनवी
मुट्ठियों में ख़ाक ले कर दोस्त आए वक़्त-ए-दफ़्न
साक़िब लखनवी
किस नज़र से आप ने देखा दिल-ए-मजरूह को
साक़िब लखनवी
कहने को मुश्त-ए-पर की असीरी तो थी मगर
साक़िब लखनवी
जिस शख़्स के जीते जी पूछा न गया 'साक़िब'
साक़िब लखनवी
हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे
साक़िब लखनवी