Couplets Poetry (page 152)
हमारे दम से है रौशन दयार-ए-फ़िक्र-ओ-सुख़न
सज्जाद बाक़र रिज़वी
दो किनारे हों तो सैल-ए-ज़िंदगी दरिया बने
सज्जाद बाक़र रिज़वी
छलकी हर मौज-ए-बदन से हुस्न की दरिया-दिली
सज्जाद बाक़र रिज़वी
राह का शजर हूँ मैं और इक मुसाफ़िर तू
सज्जाद बलूच
क्या जाने कब लम्हों की मफ़रूर समाअत लौटे
सज्जाद बाबर
तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ
साजिद सजनी
मुझ को तो ईद में भी फ़राग़त कहाँ मिली
साजिद सजनी
समझ में वक़्त का आया करिश्मा
साजिद हमीद
राएगाँ हो रही थी तंहाई
साजिद हमीद
मुंजमिद था लहू रग-ओ-पय में
साजिद हमीद
दर्द इतना भी नहीं है कि छुपा भी न सकूँ
साजिद हमीद
ऐसी आग फ़लक से बरसेगी इक दिन
साजिद हमीद
और इक चोट दीजिए मुझ को!
साजिद असर
हम को पहले भी न मिलने की शिकायत कब थी
साजिद अमजद
नक़्श जब ज़ख़्म बना ज़ख़्म भी नासूर हुआ
साइमा असमा
न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखा
साइमा असमा
मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहती
साइमा असमा
कभी कभी तो अच्छा-ख़ासा चलते चलते
साइमा असमा
जाने फिर मुँह में ज़बाँ रखने का मसरफ़ क्या है
साइमा असमा
ऐसा क्या अंधेर मचा है मेरे ज़ख़्म नहीं भरते
साइमा असमा
आज सोचा है कि ख़ुद रस्ते बनाना सीख लूँ
साइमा असमा
ज़िंदगी किस तरह कटेगी 'सैफ़'
सैफ़ुद्दीन सैफ़
ये आलाम-ए-हस्ती ये दौर-ए-ज़माना
सैफ़ुद्दीन सैफ़
उस मुसाफ़िर की नक़ाहत का ठिकाना क्या है
सैफ़ुद्दीन सैफ़
तुम ने दीवाना बनाया मुझ को
सैफ़ुद्दीन सैफ़
तुम को बेगाने भी अपनाते हैं मैं जानता हूँ
सैफ़ुद्दीन सैफ़
तुम्हारे ब'अद ख़ुदा जाने क्या हुआ दिल को
सैफ़ुद्दीन सैफ़
थकी थकी सी फ़ज़ाएँ बुझे बुझे तारे
सैफ़ुद्दीन सैफ़
शोर दिन को नहीं सोने देता
सैफ़ुद्दीन सैफ़
शायद तुम्हारे साथ भी वापस न आ सकें
सैफ़ुद्दीन सैफ़