Couplets Poetry (page 365)
इरादे बाँधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
इन तल्ख़ आँसुओं को न यूँ मुँह बना के पी
हफ़ीज़ जालंधरी
इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था
हफ़ीज़ जालंधरी
हम से ये बार-ए-लुत्फ़ उठाया न जाएगा
हफ़ीज़ जालंधरी
हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके
हफ़ीज़ जालंधरी
हाथ रख रख के वो सीने पे किसी का कहना
हफ़ीज़ जालंधरी
हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब
हफ़ीज़ जालंधरी
हाँ कैफ़-ए-बे-ख़ुदी की वो साअत भी याद है
हफ़ीज़ जालंधरी
हमेशा के लिए ख़ामोश हो कर
हफ़ीज़ जालंधरी
है मुद्दआ-ए-इश्क़ ही दुनिया-ए-मुद्दआ
हफ़ीज़ जालंधरी
'हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोली
हफ़ीज़ जालंधरी
'हफ़ीज़' अहल-ए-ज़बाँ कब मानते थे
हफ़ीज़ जालंधरी
हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो
हफ़ीज़ जालंधरी
दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल सभी कुछ ज़बान पर लाया
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल ने आँखों तक आने में इतना वक़्त लिया
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल लगाओ तो लगाओ दिल से दिल
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल को ख़ुदा की याद तले भी दबा चुका
हफ़ीज़ जालंधरी
देखा न कारोबार-ए-मोहब्बत कभी 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ जालंधरी
देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़
हफ़ीज़ जालंधरी
चराग़-ए-ख़ाना-ए-दर्वेश हों मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
बुत-कदे से चले हो काबे को
हफ़ीज़ जालंधरी
भुलाई नहीं जा सकेंगी ये बातें
हफ़ीज़ जालंधरी
बे-तअल्लुक़ ज़िंदगी अच्छी नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
ब-ज़ाहिर सादगी से मुस्कुरा कर देखने वालो
हफ़ीज़ जालंधरी
ऐ मिरी जान अपने जी के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
ऐ 'हफ़ीज़' आह आह पर आख़िर
हफ़ीज़ जालंधरी
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल
हफ़ीज़ जालंधरी
अहबाब का शिकवा क्या कीजिए ख़ुद ज़ाहिर ओ बातिन एक नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
अभी मीआद बाक़ी है सितम की
हफ़ीज़ जालंधरी