Couplets Poetry (page 363)
जो दीवानों ने पैमाइश की है मैदान-ए-क़यामत की
हफ़ीज़ जौनपुरी
जब न था ज़ब्त तो क्यूँ आए अयादत के लिए
हफ़ीज़ जौनपुरी
जब मिला कोई हसीं जान पर आफ़त आई
हफ़ीज़ जौनपुरी
इस को समझो न ख़त्त-ए-नफ़्स 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ जौनपुरी
हसीनों से फ़क़त साहिब-सलामत दूर की अच्छी
हफ़ीज़ जौनपुरी
हमें याद रखना हमें याद करना
हफ़ीज़ जौनपुरी
हाल मेरा भी जा-ए-इबरत है
हफ़ीज़ जौनपुरी
गया जो हाथ से वो वक़्त फिर नहीं आता
हफ़ीज़ जौनपुरी
बुरा ही क्या है बरतना पुरानी रस्मों का
हफ़ीज़ जौनपुरी
बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए
हफ़ीज़ जौनपुरी
बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
हफ़ीज़ जौनपुरी
बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा
हफ़ीज़ जौनपुरी
अख़ीर वक़्त है किस मुँह से जाऊँ मस्जिद को
हफ़ीज़ जौनपुरी
आशिक़ की बे-कसी का तो आलम न पूछिए
हफ़ीज़ जौनपुरी
आप ही से न जब रहा मतलब
हफ़ीज़ जौनपुरी
आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
हफ़ीज़ जौनपुरी
ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं
हफ़ीज़ जालंधरी
ये भी इक धोका था नैरंग-ए-तिलिस्म-ए-अक़्ल का
हफ़ीज़ जालंधरी
यरान-ए-बे-बिसात कि हर बाज़ी-ए-हयात
हफ़ीज़ जालंधरी
वो सरख़ुशी दे कि ज़िंदगी को शबाब से बहर-याब कर दे
हफ़ीज़ जालंधरी
वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहे हैं
हफ़ीज़ जालंधरी
वफ़ा का लाज़मी था ये नतीजा
हफ़ीज़ जालंधरी
वफ़ा जिस से की बेवफ़ा हो गया
हफ़ीज़ जालंधरी
उतरेंगे किस के हल्क़ से ये दिल-ख़राश घूँट
हफ़ीज़ जालंधरी
उठ उठ के बैठ बैठ चुकी गर्द राह की
हफ़ीज़ जालंधरी
उस की सूरत को देखता हूँ मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
तेरे कूचे में है सकूँ वर्ना
हफ़ीज़ जालंधरी
तौबा तौबा शैख़ जी तौबा का फिर किस को ख़याल
हफ़ीज़ जालंधरी
तसव्वुर में भी अब वो बे-नक़ाब आते नहीं मुझ तक
हफ़ीज़ जालंधरी