Couplets Poetry (page 361)

बस्तियाँ ही बस्तियाँ हैं गुम्बद-ए-अफ़्लाक में

हैदर अली आतिश

बरहमन खोले हीगा बुत-कदा का दरवाज़ा

हैदर अली आतिश

बंदिश-ए-अल्फ़ाज़ जड़ने से निगूँ के कम नहीं

हैदर अली आतिश

बहर-ए-हस्ती सा कोई दरिया-ए-बे-पायाँ नहीं

हैदर अली आतिश

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का

हैदर अली आतिश

ब'अद फ़रहाद के फिर कोह-कनी मैं ने की

हैदर अली आतिश

अमरद-परस्त है तो गुलिस्ताँ की सैर कर

हैदर अली आतिश

अजब तेरी है ऐ महबूब सूरत

हैदर अली आतिश

ऐसी ऊँची भी तो दीवार नहीं घर की तिरे

हैदर अली आतिश

ऐ सनम जिस ने तुझे चाँद सी सूरत दी है

हैदर अली आतिश

ऐ फ़लक कुछ तो असर हुस्न-ए-अमल में होता

हैदर अली आतिश

आतिश-ए-मस्त जो मिल जाए तो पूछूँ उस से

हैदर अली आतिश

आसमान और ज़मीं का है तफ़ावुत हर-चंद

हैदर अली आतिश

आसार-ए-इश्क़ आँखों से होने लगे अयाँ

हैदर अली आतिश

आप की नाज़ुक कमर पर बोझ पड़ता है बहुत

हैदर अली आतिश

आज तक अपनी जगह दिल में नहीं अपने हुई

हैदर अली आतिश

आफ़त-ए-जाँ हुई उस रू-ए-किताबी की याद

हैदर अली आतिश

आए भी लोग बैठे भी उठ भी खड़े हुए

हैदर अली आतिश

आदमी क्या वो न समझे जो सुख़न की क़द्र को

हैदर अली आतिश

ये दिल है मिरा या किसी कुटिया का दिया है

हफ़ीज़ ताईब

सिमटा तिरा ख़याल तो गुल-रंग अश्क था

हफ़ीज़ ताईब

ये हुनर भी बड़ा ज़रूरी है

हफ़ीज़ मेरठी

ये भी तो सोचिए कभी तन्हाई में ज़रा

हफ़ीज़ मेरठी

वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या

हफ़ीज़ मेरठी

सिर्फ़ ज़बाँ की नक़्क़ाली से बात न बन पाएगी 'हफ़ीज़'

हफ़ीज़ मेरठी

शीशा टूटे ग़ुल मच जाए

हफ़ीज़ मेरठी

शैख़ क़ातिल को मसीहा कह गए

हफ़ीज़ मेरठी

रसा हों या न हों नाले ये नालों का मुक़द्दर है

हफ़ीज़ मेरठी

मय-ख़ाने की सम्त न देखो

हफ़ीज़ मेरठी

क्या जाने क्या सबब है कि जी चाहता है आज

हफ़ीज़ मेरठी