Couplets Poetry (page 362)
कभी कभी हमें दुनिया हसीन लगती थी
हफ़ीज़ मेरठी
हर सहारा बे-अमल के वास्ते बे-कार है
हफ़ीज़ मेरठी
हाए वो नग़्मा जिस का मुग़न्नी
हफ़ीज़ मेरठी
इक अजनबी के हाथ में दे कर हमारा हाथ
हफ़ीज़ मेरठी
बद-तर है मौत से भी ग़ुलामी की ज़िंदगी
हफ़ीज़ मेरठी
अभी से होश उड़े मस्लहत-पसंदों के
हफ़ीज़ मेरठी
अब खुल के कहो बात तो कुछ बात बनेगी
हफ़ीज़ मेरठी
ज़ाहिद शराब-ए-नाब हो या बादा-ए-तुहूर
हफ़ीज़ जौनपुरी
ज़ाहिद को रट लगी है शराब-ए-तुहूर की
हफ़ीज़ जौनपुरी
याद आईं उस को देख के अपनी मुसीबतें
हफ़ीज़ जौनपुरी
उन की यकताई का दावा मिट गया
हफ़ीज़ जौनपुरी
थे चोर मय-कदे के मस्जिद के रहने वाले
हफ़ीज़ जौनपुरी
तंदुरुस्ती से तो बेहतर थी मिरी बीमारी
हफ़ीज़ जौनपुरी
तमसील ओ इस्तिआरा ओ तश्बीह सब दुरुस्त
हफ़ीज़ जौनपुरी
शब-ए-विसाल लगाया जो उन को सीने से
हफ़ीज़ जौनपुरी
सच है इस एक पर्दे में छुपते हैं लाख ऐब
हफ़ीज़ जौनपुरी
क़सम निबाह की खाई थी उम्र भर के लिए
हफ़ीज़ जौनपुरी
क़ैद में इतना ज़माना हो गया
हफ़ीज़ जौनपुरी
पी लो दो घूँट कि साक़ी की रहे बात 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ जौनपुरी
पी कर दो घूँट देख ज़ाहिद
हफ़ीज़ जौनपुरी
परी थी कोई छलावा थी या जवानी थी
हफ़ीज़ जौनपुरी
पहुँचे उस को सलाम मेरा
हफ़ीज़ जौनपुरी
ओ आँख बदल के जाने वाले
हफ़ीज़ जौनपुरी
मिरी शराब की तौबा पे जा न ऐ वाइज़
हफ़ीज़ जौनपुरी
मिरे बुत-ख़ाने से हो कर चला जा काबे को ज़ाहिद
हफ़ीज़ जौनपुरी
लुट गया वो तिरे कूचे में धरा जिस ने क़दम
हफ़ीज़ जौनपुरी
काफ़िर-ए-इश्क़ को क्या दैर-ओ-हरम से मतलब
हफ़ीज़ जौनपुरी
कभी मस्जिद में जो वाइज़ का बयाँ सुनता हूँ
हफ़ीज़ जौनपुरी
काबा के ढाने वाले वो और लोग होंगे
हफ़ीज़ जौनपुरी
जो काबे से निकले जगह दैर में की
हफ़ीज़ जौनपुरी