Couplets Poetry (page 364)
तन्हाई-ए-फ़िराक़ में उम्मीद बार-हा
हफ़ीज़ जालंधरी
सुपुर्द-ए-ख़ाक ही करना था मुझ को
हफ़ीज़ जालंधरी
सुनाता है क्या हैरत-अंगेज़ क़िस्से
हफ़ीज़ जालंधरी
रंग बदला यार ने वो प्यार की बातें गईं
हफ़ीज़ जालंधरी
क़ाएम किया है मैं ने अदम के वजूद को
हफ़ीज़ जालंधरी
फिर दे के ख़ुशी हम उसे नाशाद करें क्यूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
नासेह को बुलाओ मिरा ईमान सँभाले
हफ़ीज़ जालंधरी
नासेह को बुलाओ मिरा ईमान सँभाले
हफ़ीज़ जालंधरी
ना-कामी-ए-इश्क़ या कामयाबी
हफ़ीज़ जालंधरी
नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल
हफ़ीज़ जालंधरी
मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
मुझ को न सुना ख़िज़्र ओ सिकंदर के फ़साने
हफ़ीज़ जालंधरी
मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है
हफ़ीज़ जालंधरी
मोहब्बत करो और निबाहो तो पूछूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
मेरी क़िस्मत के नविश्ते को मिटा दे कोई
हफ़ीज़ जालंधरी
मिरी मजबूरियाँ क्या पूछते हो
हफ़ीज़ जालंधरी
मिरे डूब जाने का बाइस न पूछो
हफ़ीज़ जालंधरी
मिरा तजरबा है कि इस ज़िंदगी में
हफ़ीज़ जालंधरी
मैं वो बस्ती हूँ कि याद-ए-रफ़्तगाँ के भेस में
हफ़ीज़ जालंधरी
मबादा फिर असीर-ए-दाम-ए-अक़्ल-ओ-होश हो जाऊँ
हफ़ीज़ जालंधरी
क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है
हफ़ीज़ जालंधरी
कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया
हफ़ीज़ जालंधरी
कोई चारा नहीं दुआ के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
किस मुँह से कह रहे हो हमें कुछ ग़रज़ नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
ख़ुदा को न तकलीफ़ दे डूबने में
हफ़ीज़ जालंधरी
ख़ामोश हो गईं जो उमंगें शबाब की
हफ़ीज़ जालंधरी
कैसे बंद हुआ मय-ख़ाना अब मालूम हुआ
हफ़ीज़ जालंधरी
जिस ने इस दौर के इंसान किए हैं पैदा
हफ़ीज़ जालंधरी
जैसे वीराने से टकरा के पलटती है सदा
हफ़ीज़ जालंधरी