Couplets Poetry (page 366)

अब मुझे मानें न मानें ऐ 'हफ़ीज़'

हफ़ीज़ जालंधरी

आँख कम-बख़्त से उस बज़्म में आँसू न रुका

हफ़ीज़ जालंधरी

आने वाले किसी तूफ़ान का रोना रो कर

हफ़ीज़ जालंधरी

आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए

हफ़ीज़ जालंधरी

आ ही गया वो मुझ को लहद में उतारने

हफ़ीज़ जालंधरी

ज़माने भर के ग़म या इक तिरा ग़म

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ये तमीज़-ए-इश्क़-ओ-हवस नहीं है हक़ीक़तों से गुरेज़ है

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ये दिलकशी कहाँ मिरी शाम-ओ-सहर में थी

हफ़ीज़ होशियारपुरी

तिरी तलाश में जब हम कभी निकलते हैं

हफ़ीज़ होशियारपुरी

तिरी तलाश है या तुझ से इज्तिनाब है ये

हफ़ीज़ होशियारपुरी

तिरे जाते ही ये आलम है जैसे

हफ़ीज़ होशियारपुरी

तमाम उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया

हफ़ीज़ होशियारपुरी

तमाम उम्र किया हम ने इंतिज़ार-ए-बहार

हफ़ीज़ होशियारपुरी

नज़र से हद्द-ए-नज़र तक तमाम तारीकी

हफ़ीज़ होशियारपुरी

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे

हफ़ीज़ होशियारपुरी

कहीं ये तर्क-ए-मोहब्बत की इब्तिदा तो नहीं

हफ़ीज़ होशियारपुरी

जब कभी हम ने किया इश्क़ पशेमान हुए

हफ़ीज़ होशियारपुरी

हम को मंज़िल ने भी गुमराह किया

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ग़म-ए-ज़िंदगानी के सब सिलसिले

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ग़म-ए-ज़माना तिरी ज़ुल्मतें ही क्या कम थीं

हफ़ीज़ होशियारपुरी

दुनिया में हैं काम बहुत

हफ़ीज़ होशियारपुरी

दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त

हफ़ीज़ होशियारपुरी

दिल से आती है बात लब पे 'हफ़ीज़'

हफ़ीज़ होशियारपुरी

दिल में इक शोर सा उठा था कभी

हफ़ीज़ होशियारपुरी

अगर तू इत्तिफ़ाक़न मिल भी जाए

हफ़ीज़ होशियारपुरी

अब यही मेरे मशाग़िल रह गए

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को

हफ़ीज़ बनारसी

वो बात 'हफ़ीज़' अब नहीं मिलती किसी शय में

हफ़ीज़ बनारसी

वफ़ा नज़र नहीं आती कहीं ज़माने में

हफ़ीज़ बनारसी

उस से बढ़ कर किया मिलेगा और इनआम-ए-जुनूँ

हफ़ीज़ बनारसी