Couplets Poetry (page 367)
उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं
हफ़ीज़ बनारसी
तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है
हफ़ीज़ बनारसी
समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम
हफ़ीज़ बनारसी
सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
हफ़ीज़ बनारसी
फूल अफ़्सुर्दा बुलबुलें ख़ामोश
हफ़ीज़ बनारसी
मिले फ़ुर्सत तो सुन लेना किसी दिन
हफ़ीज़ बनारसी
मैं ने आबाद किए कितने ही वीराने 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ बनारसी
कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है
हफ़ीज़ बनारसी
किसी का घर जले अपना ही घर लगे है मुझे
हफ़ीज़ बनारसी
किस मुँह से करें उन के तग़ाफ़ुल की शिकायत
हफ़ीज़ बनारसी
कभी ख़िरद कभी दीवानगी ने लूट लिया
हफ़ीज़ बनारसी
जो पर्दों में ख़ुद को छुपाए हुए हैं
हफ़ीज़ बनारसी
इश्क़ में मारका-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र क्या कहिए
हफ़ीज़ बनारसी
हिसार-ए-ज़ात के दीवार-ओ-दर में क़ैद रहे
हफ़ीज़ बनारसी
हर हक़ीक़त है एक हुस्न 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ बनारसी
गुमशुदगी ही अस्ल में यारो राह-नुमाई करती है
हफ़ीज़ बनारसी
एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है
हफ़ीज़ बनारसी
इक हुस्न-ए-तसव्वुर है जो ज़ीस्त का साथी है
हफ़ीज़ बनारसी
दुश्मनों की जफ़ा का ख़ौफ़ नहीं
हफ़ीज़ बनारसी
चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है
हफ़ीज़ बनारसी
आसान नहीं मरहला-ए-तर्क-ए-वफ़ा भी
हफ़ीज़ बनारसी
वो पूछते हैं दिल-ए-मुब्तला का हाल और हम
हादी मछलीशहरी
उठने को तो उठा हूँ महफ़िल से तिरी लेकिन
हादी मछलीशहरी
उस ने इस अंदाज़ से देखा मुझे
हादी मछलीशहरी
तुम अज़ीज़ और तुम्हारा ग़म भी अज़ीज़
हादी मछलीशहरी
तू है बहार तो दामन मिरा हो क्यूँ ख़ाली
हादी मछलीशहरी
मिरा वजूद हक़ीक़त मिरा अदम धोका
हादी मछलीशहरी
लुत्फ़-ए-जफ़ा इसी में है याद-ए-जफ़ा न आए फिर
हादी मछलीशहरी
हर मुसीबत थी मुझे ताज़ा पयाम-ए-आफ़ियत
हादी मछलीशहरी
ग़ज़ब है ये एहसास वारस्तगी का
हादी मछलीशहरी