Couplets Poetry (page 419)

मैं अपनी ख़ुशियाँ अकेले मनाया करता हूँ

फ़ैज़ान हाशमी

ख़ला में गिरवी रक्खा अपने सारे ख़्वाबों को

फ़ैज़ान हाशमी

जिस परी पर मर मिटे थे वो परी-ज़ादी न थी

फ़ैज़ान हाशमी

बस यही सोच के रहता हूँ मैं ज़िंदा इस में

फ़ैज़ान हाशमी

बहुत क़दीम नहीं कल का वाक़िआ है ये

फ़ैज़ान हाशमी

जहाँ फ़ैज़ान-ए-आबादी बहुत है

फ़ैज़ान आरिफ़

जागते जागते इक उम्र कटी हो जैसे

फ़ैज़ अनवर

पागल-पन में आ कर पागल कुछ भी तो कर सकता है

फ़ैज़ आलम बाबर

देखता है कौन 'बाबर' किस का क्या किरदार है

फ़ैज़ आलम बाबर

ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़ेर-ए-लब है अभी तबस्सुम-ए-दोस्त

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यूँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो आ रहे हैं वो आते हैं आ रहे होंगे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तेज़ है आज दर्द-ए-दिल साक़ी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शैख़ साहब से रस्म-ओ-राह न की

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सारी दुनिया से दूर हो जाए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सजाओ बज़्म ग़ज़ल गाओ जाम ताज़ा करो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

नहीं शिकायत-ए-हिज्राँ कि इस वसीले से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़