Couplets Poetry (page 418)
जब सफ़ीना मौज से टकरा गया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
इस तरह रहबर ने लूटा कारवाँ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
गुल तो गुल ख़ार तक चुन लिए हैं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़म से नाज़ुक ज़ब्त-ए-ग़म की बात है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़ैरत-ए-अहल-ए-चमन को क्या हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
इक तुझ को देखने के लिए बज़्म में मुझे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते
फ़ना निज़ामी कानपुरी
दुनिया पे ऐसा वक़्त पड़ेगा कि एक दिन
फ़ना निज़ामी कानपुरी
दिल से अगर कभी तिरा अरमान जाएगा
फ़ना निज़ामी कानपुरी
बे-तकल्लुफ़ वो औरों से हैं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
अंधेरों को निकाला जा रहा है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ऐ जल्वा-ए-जानाना फिर ऐसी झलक दिखला
फ़ना निज़ामी कानपुरी
आज उस से मैं ने शिकवा किया था शरारतन
फ़ना निज़ामी कानपुरी
उठा पर्दा तो महशर भी उठेगा दीदा-ए-दिल में
फ़ना बुलंदशहरी
क्या भूल गए हैं वो मुझे पूछना क़ासिद
फ़ना बुलंदशहरी
इस जहाँ में नहीं कोई अहल-ए-वफ़ा
फ़ना बुलंदशहरी
ऐ 'फ़ना' मेरी मय्यत पे कहते हैं वो
फ़ना बुलंदशहरी
आग़ाज़ तो अच्छा था 'फ़ना' दिन भी भले थे
फ़ना बुलंदशहरी
ये जो लाहौर से मोहब्बत है
फख़्र अब्बास
जब बुलंदी पर पहुँच जाते हैं लोग
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
ज़ुल्म करता हूँ ज़ुल्म सहता हूँ
फ़ैज़ी
सोचता क्या हूँ तिरे बारे में चलते चलते
फ़ैज़ी
पड़ गया है ख़ुदा से काम मुझे
फ़ैज़ी
मैं सुब्ह ख़्वाब से जागा तो ये ख़याल आया
फ़ैज़ी
किसे ढूँडता हूँ मैं अपने क़़ुर्ब-ओ-जवार में
फ़ैज़ी
जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में
फ़ैज़ी
वो क्या ख़ुशी थी जो दिल में बहाल रहती थी
फ़ैज़ान हाशमी
तेरी ही सैर के लिए आता रहूँगा बार बार
फ़ैज़ान हाशमी
तेरा बोसा ऐसा प्याला है जिस में से
फ़ैज़ान हाशमी
मैं उस को ख़्वाब में कुछ ऐसे देखा करता था
फ़ैज़ान हाशमी