Couplets Poetry (page 420)
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मेरी ख़ामोशियों में लर्ज़ां है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ख़ैर दोज़ख़ में मय मिले न मिले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
करो कज जबीं पे सर-ए-कफ़न मिरे क़ातिलों को गुमाँ न हो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जो तलब पे अहद-ए-वफ़ा किया तो वो आबरू-ए-वफ़ा गई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जो नफ़स था ख़ार-ए-गुलू बना जो उठे थे हाथ लहू हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जवाँ-मर्दी उसी रिफ़अत पे पहुँची
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
जानता है कि वो न आएँगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
इन में लहू जला हो हमारा कि जान ओ दिल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम से कहते हैं चमन वाले ग़रीबान-ए-चमन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम शैख़ न लीडर न मुसाहिब न सहाफ़ी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम सहल-तलब कौन से फ़रहाद थे लेकिन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम अहल-ए-क़फ़स तन्हा भी नहीं हर रोज़ नसीम-ए-सुब्ह-ए-वतन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हाँ नुक्ता-वरो लाओ लब-ओ-दिल की गवाही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़