Couplets Poetry (page 417)
बहला न दिल न तीरगी-ए-शाम-ए-ग़म गई
फ़ानी बदायुनी
अपनी जन्नत मुझे दिखला न सका तू वाइज़
फ़ानी बदायुनी
अपनी ही निगाहों का ये नज़्ज़ारा कहाँ तक
फ़ानी बदायुनी
ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए
फ़ानी बदायुनी
अब नए सुर से छेड़ पर्दा-ए-साज़
फ़ानी बदायुनी
आते हैं अयादत को तो करते हैं नसीहत
फ़ानी बदायुनी
आँख उठाई ही थी कि खाई चोट
फ़ानी बदायुनी
आबादी भी देखी है वीराने भी देखे हैं
फ़ानी बदायुनी
ज़िंदगी नाम है इक जोहद-ए-मुसलसल का 'फ़ना'
फ़ना निज़ामी कानपुरी
यूँ दिखाता है आँखें हमें बाग़बाँ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
वो आँख क्या जो आरिज़ ओ रुख़ पर ठहर न जाए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तू कुछ तो मिरे ज़ब्त-ए-मोहब्बत का सिला दे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तिरे वादों पे कहाँ तक मिरा दिल फ़रेब खाए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तरतीब दे रहा था मैं फ़हरिस्त-ए-दुश्मनान
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तर्क-ए-वतन के बाद ही क़द्र-ए-वतन हुई
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तर्क-ए-तअल्लुक़ात को इक लम्हा चाहिए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
सहता रहा जफ़ा-ए-दोस्त कहता रहा अदा-ए-दोस्त
फ़ना निज़ामी कानपुरी
साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर
फ़ना निज़ामी कानपुरी
सब होंगे उस से अपने तआरुफ़ की फ़िक्र में
फ़ना निज़ामी कानपुरी
रिंद जन्नत में जा भी चुके
फ़ना निज़ामी कानपुरी
रहता है वहाँ ज़िक्र-ए-तुहूर-ओ-मय-ए-कौसर
फ़ना निज़ामी कानपुरी
क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात भी क्या चीज़ है 'फ़ना'
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मौजों के इत्तिहाद का आलम न पूछिए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मैं उस के सामने से गुज़रता हूँ इस लिए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मैं चला आया तिरा हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल ले कर
फ़ना निज़ामी कानपुरी
कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास-ए-मोहब्बत है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
कोई समझेगा क्या राज़-ए-गुलशन
फ़ना निज़ामी कानपुरी
कोई पाबंद-ए-मोहब्बत ही बता सकता है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
जल्वा हो तो जल्वा हो पर्दा हो तो पर्दा हो
फ़ना निज़ामी कानपुरी