Couplets Poetry (page 538)

मोती समझ के शान-ए-करीमी ने चुन लिए

अल्लामा इक़बाल

मिलेगा मंज़िल-ए-मक़्सूद का उसी को सुराग़

अल्लामा इक़बाल

मिरी निगाह में वो रिंद ही नहीं साक़ी

अल्लामा इक़बाल

मिरे जुनूँ ने ज़माने को ख़ूब पहचाना

अल्लामा इक़बाल

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

अल्लामा इक़बाल

मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने

अल्लामा इक़बाल

मक़ाम-ए-शौक़ तिरे क़ुदसियों के बस का नहीं

अल्लामा इक़बाल

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

अल्लामा इक़बाल

मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं

अल्लामा इक़बाल

मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है

अल्लामा इक़बाल

मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा

अल्लामा इक़बाल

मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा

अल्लामा इक़बाल

महीने वस्ल के घड़ियों की सूरत उड़ते जाते हैं

अल्लामा इक़बाल

कुशादा दस्त-ए-करम जब वो बे-नियाज़ करे

अल्लामा इक़बाल

किसे ख़बर कि सफ़ीने डुबो चुकी कितने

अल्लामा इक़बाल

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

अल्लामा इक़बाल

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

अल्लामा इक़बाल

ख़ुदावंदा ये तेरे सादा-दिल बंदे किधर जाएँ

अल्लामा इक़बाल

कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है

अल्लामा इक़बाल

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को

अल्लामा इक़बाल

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

अल्लामा इक़बाल

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी

अल्लामा इक़बाल

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में

अल्लामा इक़बाल

जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में

अल्लामा इक़बाल

जलाल-ए-पादशाही हो कि जमहूरी तमाशा हो

अल्लामा इक़बाल

जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही

अल्लामा इक़बाल

इसी ख़ता से इताब-ए-मुलूक है मुझ पर

अल्लामा इक़बाल

इश्क़ तिरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा

अल्लामा इक़बाल

इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब में

अल्लामा इक़बाल

इल्म में भी सुरूर है लेकिन

अल्लामा इक़बाल