Couplets Poetry (page 536)
हुस्न की दिलकशी पे नाज़ न कर
आलोक यादव
हद-ए-इमकान से आगे मैं जाना चाहता हूँ पर
आलोक यादव
एक उम्र से तुझे मैं बे-उज़्र पी रहा हूँ
आलोक यादव
दिलकशी थी उन्सियत थी या मोहब्बत या जुनून
आलोक यादव
धावा बोलेगा बहुत जल्द ख़िज़ाँ का लश्कर
आलोक यादव
सब सितारे दिलासा देते हैं
आलोक मिश्रा
मैं भी बिखरा हुआ हूँ अपनों में
आलोक मिश्रा
क्या क़यामत है कि तेरी ही तरह से मुझ से
आलोक मिश्रा
जब से देखा है ख़्वाब में उस को
आलोक मिश्रा
जाने किस बात से दुखा है बहुत
आलोक मिश्रा
एक पत्ता हूँ शाख़ से बिछड़ा
आलोक मिश्रा
बुझती आँखों में तिरे ख़्वाब का बोसा रक्खा
आलोक मिश्रा
ज़िंदगानी की हक़ीक़त कोहकन के दिल से पूछ
अल्लामा इक़बाल
ज़मीर-ए-लाला मय-ए-लाल से हुआ लबरेज़
अल्लामा इक़बाल
ज़माना अक़्ल को समझा हुआ है मिशअल-ए-राह
अल्लामा इक़बाल
ज़माम-ए-कार अगर मज़दूर के हाथों में हो फिर क्या
अल्लामा इक़बाल
यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
अल्लामा इक़बाल
ये काएनात अभी ना-तमाम है शायद
अल्लामा इक़बाल
ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
अल्लामा इक़बाल
ये है ख़ुलासा-ए-इल्म-ए-क़लंदरी कि हयात
अल्लामा इक़बाल
यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
अल्लामा इक़बाल
यही ज़माना-ए-हाज़िर की काएनात है क्या
अल्लामा इक़बाल
वो हर्फ़-ए-राज़ कि मुझ को सिखा गया है जुनूँ
अल्लामा इक़बाल
वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है
अल्लामा इक़बाल
वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग
अल्लामा इक़बाल
उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर
अल्लामा इक़बाल
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
अल्लामा इक़बाल
उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
अल्लामा इक़बाल
उमीद-ए-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ को
अल्लामा इक़बाल
तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू
अल्लामा इक़बाल