Couplets Poetry (page 534)
जी चाहता है साने-ए-क़ुदरत पे हूँ निसार
अमानत लखनवी
बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले
अमानत लखनवी
बस इतना याद है तुझ से मिला था रस्ते में
अल्ताफ़ परवाज़
टपके जो अश्क वलवले शादाब हो गए
अल्ताफ़ मशहदी
पी के जीते हैं जी के पीते हैं
अल्ताफ़ मशहदी
फिर दयार-ए-हिन्द को आबाद करने के लिए
अल्ताफ़ मशहदी
यारान-ए-तेज़-गाम ने महमिल को जा लिया
अल्ताफ़ हुसैन हाली
यही है इबादत यही दीन ओ ईमाँ
अल्ताफ़ हुसैन हाली
वो उम्मीद क्या जिस की हो इंतिहा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
उस के जाते ही ये क्या हो गई घर की सूरत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
तुम को हज़ार शर्म सही मुझ को लाख ज़ब्त
अल्ताफ़ हुसैन हाली
तुम ऐसे कौन ख़ुदा हो कि उम्र भर तुम से
अल्ताफ़ हुसैन हाली
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ताज़ीर-ए-जुर्म-ए-इश्क़ है बे-सर्फ़ा मोहतसिब
अल्ताफ़ हुसैन हाली
शहद-ओ-शकर से शीरीं उर्दू ज़बाँ हमारी
अल्ताफ़ हुसैन हाली
सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
सदा एक ही रुख़ नहीं नाव चलती
अल्ताफ़ हुसैन हाली
रोना है ये कि आप भी हँसते थे वर्ना याँ
अल्ताफ़ हुसैन हाली
राह के तालिब हैं पर बे-राह पड़ते हैं क़दम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
क़लक़ और दिल में सिवा हो गया
अल्ताफ़ हुसैन हाली
क़ैस हो कोहकन हो या 'हाली'
अल्ताफ़ हुसैन हाली
मुँह कहाँ तक छुपाओगे हम से
अल्ताफ़ हुसैन हाली
मुझे कल के वादे पे करते हैं रुख़्सत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
क्यूँ बढ़ाते हो इख़्तिलात बहुत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
कुछ हँसी खेल सँभलना ग़म-ए-हिज्राँ में नहीं
अल्ताफ़ हुसैन हाली
कहते हैं जिस को जन्नत वो इक झलक है तेरी
अल्ताफ़ हुसैन हाली
जानवर आदमी फ़रिश्ता ख़ुदा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद
अल्ताफ़ हुसैन हाली
हम ने अव्वल से पढ़ी है ये किताब आख़िर तक
अल्ताफ़ हुसैन हाली