Couplets Poetry (page 533)
यूँ दिल है सर-ब-सज्दा किसी के हुज़ूर में
अमीन हज़ीं
तुझ को तिरी ही आँख से देख रही है काएनात
अमीन हज़ीं
रस्ते की ऊँच नीच से वाक़िफ़ तो हूँ 'अमीं'
अमीन हज़ीं
नुमूद-ए-रंग-ओ-बू ने मार डाला
अमीन हज़ीं
ज़माना गुज़रा हवा फिर से याद आने लगा
अम्बर वसीम इलाहाबादी
तू मुस्कुराती रहे है ये आरज़ू मेरी
अम्बर वसीम इलाहाबादी
तिरी निगाह बनी आइना मिरी ख़ातिर
अम्बर वसीम इलाहाबादी
मुझे यक़ीं है मिरा साथ दे नहीं सकता
अम्बर वसीम इलाहाबादी
हिजाब-ए-अब्र रुख़-ए-महताब से छलका
अम्बर वसीम इलाहाबादी
रेत है सूरज है वुसअत है तन्हाई
अम्बरीन सलाहुद्दीन
ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा
अम्बर बहराईची
उस ने हर ज़र्रे को तिलिस्म-आबाद किया
अम्बर बहराईची
सूप के दाने कबूतर चुग रहा था और वो
अम्बर बहराईची
रोज़ हम जलती हुई रेत पे चलते ही न थे
अम्बर बहराईची
मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत
अम्बर बहराईची
जाने क्या सोच के फिर इन को रिहाई दे दी
अम्बर बहराईची
जाने क्या बरसा था रात चराग़ों से
अम्बर बहराईची
जान देने का हुनर हर शख़्स को आता नहीं
अम्बर बहराईची
हम पी भी गए और सलामत भी हैं 'अम्बर'
अम्बर बहराईची
हर फूल पे उस शख़्स को पत्थर थे चलाने
अम्बर बहराईची
हर इक नदी से कड़ी प्यास ले के वो गुज़रा
अम्बर बहराईची
गए थे हम भी बहर की तहों में झूमते हुए
अम्बर बहराईची
इक शफ़्फ़ाफ़ तबीअत वाला सहराई
अम्बर बहराईची
एक सन्नाटा बिछा है इस जहाँ में हर तरफ़
अम्बर बहराईची
एक साहिर कभी गुज़रा था इधर से 'अम्बर'
अम्बर बहराईची
चेहरों पे ज़र-पोश अंधेरे फैले हैं
अम्बर बहराईची
बाहर सारे मैदाँ जीत चुका था वो
अम्बर बहराईची
आम के पेड़ों के सारे फल सुनहरे हो गए
अम्बर बहराईची
साँवले तन पे क़बा है जो तिरे भारी है
अमानत लखनवी
किस तरह 'अमानत' न रहूँ ग़म से मैं दिल-गीर
अमानत लखनवी